खेल, किताबें और रचनात्मक गतिविधियों को बढ़ावा दें – {रोज कम से कम एक घंटा आउटडोर खेलने का समय तय करें। {भोजन और सोने के समय स्क्रीन का इस्तेमाल न होने दें। {छुट्टी वाले दिन परिवार के साथ पार्क या साइकिलिंग की योजना बनाएं। बच्चों के सामने खुद भी मोबाइल का सीमित उपयोग करें। {स्क्रीन टाइम के बदले खेल, किताबें और रचनात्मक गतिविधियों को बढ़ावा दें। भास्कर न्यूज| लुधियाना शाम के समय कभी बच्चों की आवाजों से गूंजने वाले पार्क अब पहले जैसे नजर नहीं आते। झूले खाली रहते हैं, जबकि घरों में मोबाइल, टैबलेट, टीवी और वीडियो गेम बच्चों के नए साथी बन चुके हैं। पढ़ाई के बाद बचा समय अब मैदान में दौड़ने के बजाय स्क्रीन पर बीत रहा है। इसका असर सिर्फ बच्चों की फिटनेस पर नहीं, बल्कि उनकी मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक सेहत पर भी दिखने लगा है। शहर के कई रिहायशी इलाकों में माता-पिता मानते हैं कि पहले बच्चे रोजाना बाहर खेलने जाते थे, लेकिन अब उनकी पहली पसंद मोबाइल या गेमिंग बन गई है। वहीं, विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार घटती फिजिकल एक्टिविटी भविष्य में मोटापा, आंखों की समस्याएं, कमजोर मांसपेशियां, तनाव और आत्मविश्वास में कमी जैसी परेशानियों को बढ़ा सकती है। बच्चों का खेल सिर्फ मनोरंजन नहीं, संपूर्ण विकास का आधार: विशेषज्ञ बताते हैं कि दौड़ना, कूदना, साइकिल चलाना और टीम गेम खेलने से बच्चों की हड्डियां मजबूत होती हैं। साथ ही नेतृत्व क्षमता, टीमवर्क, धैर्य, समस्या समाधान और सामाजिक व्यवहार भी विकसित होता है। जब बच्चे केवल स्क्रीन पर समय बिताते हैं तो वे वास्तविक सामाजिक अनुभवों से दूर होने लगते हैं। {माता-पिता की व्यस्तता भी बन रही बड़ी वजह : कई परिवारों में दोनों माता-पिता नौकरी करते हैं। ऐसे में बच्चों को व्यस्त रखने के लिए मोबाइल या टैबलेट देना आसान विकल्प बन जाता है। इसके अलावा सुरक्षित खेल मैदानों की कमी, बढ़ता ट्रैफिक, ट्यूशन और पढ़ाई का दबाव भी बच्चों के आउटडोर खेलने का समय कम कर रहा है। {स्कूलों की भी जिम्मेदारी : केवल पढ़ाई ही पर्याप्त नहीं है। स्कूलों में नियमित स्पोर्ट्स पीरियड, आउटडोर गेम्स और एक्टिविटी आधारित कार्यक्रम बच्चों को स्क्रीन से बाहर लाने में मदद कर सकते हैं। कई स्कूल अब फिटनेस चैलेंज, योग और स्पोर्ट्स क्लब जैसी गतिविधियों पर भी जोर दे रहे हैं। बढ़ता स्क्रीन टाइम बच्चों की शारीरिक सक्रियता को तेजी से कम कर रहा है। रोज कम से कम 60 मिनट की फिजिकल एक्टिविटी बच्चों के स्वस्थ विकास के लिए जरूरी है। माता-पिता खुद भी बच्चों के साथ पार्क जाएं और स्क्रीन के बजाय खेल को परिवार की दिनचर्या का हिस्सा बनाएं।बाहर खेलना केवल शरीर ही नहीं, दिमाग के विकास के लिए भी जरूरी है। बच्चों को दोस्तों के साथ खेलने से आत्मविश्वास, संवाद कौशल और भावनाओं को संभालने की क्षमता विकसित होती है। स्क्रीन इन अनुभवों की जगह नहीं ले सकती। {केस-1 : पार्क जाने की जगह ऑनलाइन गेम ने ले ली : 11 साल का बच्चा पहले रोजाना क्रिकेट खेलने जाता था। पिछले एक साल से उसकी रुचि ऑनलाइन गेम में बढ़ गई। अब वह स्कूल से लौटने के बाद दो से तीन घंटे मोबाइल पर बिताता है। परिवार ने महसूस किया कि उसकी दौड़ने की क्षमता कम हुई है और बाहर खेलने की इच्छा भी लगभग खत्म हो गई। अब माता-पिता ने रोज शाम एक घंटा पार्क ले जाने का नियम बनाया है। {केस-2 : स्क्रीन कम हुई तो बदला व्यवहार : 9 साल की बच्ची स्कूल के बाद टीवी और टैबलेट पर कार्टून देखने की आदी हो गई थी। धीरे-धीरे उसने साइकिल चलाना और दोस्तों के साथ खेलना भी छोड़ दिया। जब परिवार ने स्क्रीन टाइम सीमित कर उसे रोज पार्क भेजना शुरू किया तो कुछ ही हफ्तों में उसकी नींद, भूख और पढ़ाई में एकाग्रता पहले से बेहतर होने लगी।


