आर्थिक बोझ तो बहुत बढ़ गया है, लेकिन जान से बढ़कर तो कुछ नहीं है। अभी नल से पानी नहीं आ रहा, बोरिंग का जो पानी आता है, उसका उपयोग केवल नहाने और कपड़े धोने जैसे कामों में कर रहे हैं। इंदौर के भागीरथपुरा में रहने वाले धर्मेंद्र की आवाज में बेबसी साफ झलकती है। दरअसल, 20 मौतों के बाद अब धर्मेंद्र और उनका परिवार न तो टैंकर का पानी पी रहा है और न बोरिंग का। वो अब रोजाना 40 रु. की मिनरल्स वाटर की बोतल मंगा रहे हैं। ऐसा केवल धर्मेंद्र ही नहीं कर रहे हैं, बल्कि भागीरथपुरा में रहने वाला हर दूसरा शख्स अब मिनरल वाटर पी रहा है। जिसके चलते पिछले दस दिनों में इसकी खपत में पांच गुना बढ़ोतरी हो गई है। पढ़िए रिपोर्ट पैक्ड पानी पर विश्वास, ब्रांडेड के साथ लोकल ब्रांड की खपत बढ़ी
भागीरथपुरा कांड ने शहरवासियों को पीने के पानी के बारे में एक बार फिर सोचने पर मजबूर कर दिया है। शहरभर में बिसलेरी, किनले और लोकल ब्रांड की खपत में 30 फीसदी का इजाफा हुआ है। बिसलेरी के डिस्ट्रीब्यूटर रविकांत वर्मा बताते हैं कि 20 से 30 फीसदी की डिमांड बढ़ गई है। नए कस्टमर ज्यादा जुड़े हैं। उन क्षेत्रों से भी डिमांड आ रही है, जहां साफ पानी आ रहा है,लेकिन लोग रिस्क नहीं लेना चाहते। वह जार और छोटी बोतल (5 लीटर) लेना पसंद कर रहे हैं। सबसे ज्यादा डर बाहर से पढ़ने आने वाले बच्चों में हैं जो होस्टल में रहते हैं। उनके परिजन ज्यादा चिंतित हैं। वह गूगल पर कान्टैक्ट ढूंढ कर फोन करते हैं कि हमारा बच्चा वहीं रहता उनके यहां पानी पहुंचा दीजिये। जहां हमारी सप्लाई नहीं है वहां पानी पहुंचाने के लिए एक्स्ट्रा पैसे भी देने को तैयार है। ठंड और बारिश के दिनों में सेल में 20 से 30 फीसदी का डाउनफॉल आता है लेकिन इस बार इतना ही प्रतिशत बढ़ा है। शहर में 200 से ज्यादा छोटे बड़े प्लांट हैं और उनके अपने ब्रांड भी हैं। जिनकी खपत में भी 25 से 30 प्रतिशत का इजाफा हुआ है। दिसंबर में 15 लाख 60 हजार लीटर पानी सप्लाई हुआ
बिसलेरी के सेल्स हेड मप्र हर्षवर्धन सिंह ठाकुर ने बताया कि नवंबर में हमारी सेल 70 हजार बॉक्स (8 लाख 40 हजार लीटर रही थी।) दिसंबर में 1 लाख 30 हजार बॉक्स (15 लाख 60 हजार लीटर) पानी सप्लाई किया है। डेढ़ से दो सप्ताह में 20 से 25 परसेंट की ग्रोथ आई है। हास्टल में पढ़ने वाले बच्चे हों या फिर घरेलू महिलाएं, बिसलेरी का जार मंगवाना ही पसंद कर रहे हैं। बच्चे बाहर रहकर पढ़ते हैं। खाने पर लगभग 200 रुपए खर्च करते हैं तो वह 20 रुपए की बोतल लेने पर ही विश्वास करते हैं और दुकान वालों को भी टोकते हैं कि खाने में साफ पानी का उपयोग करें। भागीरथपुरा की घटना के बाद डिमांड ज्यादा है। उस हिसाब से सप्लाई को मेंटेन करना पड़ रहा है। डर और आर्थिक बोझ के बीच पिसता आम आदमी
भागीरथपुरा की तंग गलियों में घूमते हुए हर चेहरे पर एक अनकहा डर दिखाई देता है। घरों के बाहर लगे नलों पर ताले तो नहीं है, लेकिन कई दिनों से बंद पड़े हैं। यहीं पर एक छोटे से किराए के मकान में अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ रहने वाले धर्मेंद्र सिंह का दर्द इस त्रासदी की भयावहता को बयां करता है। घर में ही जनरल स्टोर चलाकर परिवार का पेट पालने वाले धर्मेंद्र कहते हैं, ‘यहां का पानी जहरीला हो चुका है। लोग मर रहे हैं। कैसे अपने बच्चों को यह पानी पिलाएं? रोज 40 रुपए का एक कैंपर खरीदकर ला रहा हूं। उसी पानी से खाना बनता है और उसी को पीते हैं। रोज एक कैंपर लग जाता है।’ उनकी आवाज में बेबसी साफ झलकती है। ‘अब अतिरिक्त खर्च तो बहुत बढ़ गया है, लेकिन जान से बढ़कर तो कुछ नहीं है। अभी नल से पानी नहीं आ रहा, बोरिंग का जो पानी आता है, उसका उपयोग केवल नहाने और कपड़े धोने जैसे कामों में कर रहे हैं।’ वहीं, कई परिवार ऐसे भी हैं जिनके लिए रोज 40-50 रुपए पानी पर खर्च करना संभव नहीं है। वे डर के साए में जी रहे हैं और पानी को उबालकर पीने को मजबूर हैं। क्षेत्र के ही निवासी सतीश सांगले बताते हैं, “पेट में अजीब सा कटाव महसूस होता है। संजीवनी क्लिनिक से दवाई तो ले आया हूं, लेकिन डर कम नहीं हुआ। हम पानी उबाल कर ही पी रहे हैं।” बाजार का बदला गणित, पांच गुना बढ़ी मिनरल वाटर की मांग
इस त्रासदी ने क्षेत्र के अर्थशास्त्र को भी पूरी तरह बदल दिया है। लोगों के अविश्वास ने मिनरल वाटर के कारोबार को अप्रत्याशित रूप से बढ़ा दिया है। भागीरथपुरा चौकी के ठीक सामने आरओ प्लांट चलाने वाले कमल परमार बताते हैं कि स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। ‘पहले हम दिनभर में 20 से 25 कैंपर ही सप्लाई करते थे। अब यह संख्या 100 से 125 तक पहुंच गई है।’ दूषित पानी से हो रही मौतों के बाद मिनरल वाटर की मांग आसमान छू रही है। परमार आगे बताते हैं, ‘पहले हमारी गाड़ी सिर्फ़ सुबह सप्लाई के लिए निकलती थी, लेकिन अब हमें सुबह और शाम, दोनों समय गाड़ियां भेजनी पड़ रही हैं। इस क्षेत्र में कुल चार आरओ प्लांट हैं और सभी जगह मांग लगभग पांच गुना बढ़ गई है। फोन लगातार बजते रहते हैं। इस मुश्किल घड़ी में उन्होंने मानवता को भी जिंदा रखा है। होटल और चाय की दुकानों पर भी मिनरल वाटर का इस्तेमाल
यह डर सिर्फ घरों तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यवसायिक प्रतिष्ठानों पर भी इसका गहरा असर दिख रहा है। भागीरथपुरा चौराहे पर भोजनालय चलाने वाली लक्ष्मी पटेल ने बताया कि उन्होंने खाना बनाने के लिए बोरिंग के पानी का उपयोग पूरी तरह बंद कर दिया है। ‘पहले हम बोरिंग का पानी ही इस्तेमाल करते थे, लेकिन जब से मौतों का सिलसिला शुरू हुआ है, हमने मिनरल वाटर से खाना बनाना शुरू कर दिया है। रोज दो कैंपर खाना बनाने में लग जाते हैं। उन्होंने आगे कहा, ‘हमारे भोजनालय में जो भी ग्राहक आता है, हम उसे पीने के लिए भी मिनरल वाटर की बोतल ही देते हैं। हम कोई जोखिम नहीं लेना चाहते। चाय में बिसलेरी, समोसे का मैदा फिल्टर वाटर से बना रहे
इस क्षेत्र में 25 से ज्यादा चाय की छोटी-बड़ी दुकानें हैं, और सभी पर अब मिनरल वाटर के कैरेट रखे दिखना आम बात है। भागीरथपुरा के चौराहे पर ही है टोपीलाल की फेमस होटल। जहां की चाय और समोसे खासे पसंद किए जाते हैं। दूषित पानी का प्रकोप इसी क्षेत्र में फैला, जिसके बाद से ग्राहकी कम हो गई। संचालक तुषार वर्मा बताते हैं, लोग डरे हुए हैं। चाय पीने से पहले भी पूछते हैं पानी कौन सा डाल रहे हो। हम चाय भी ग्राहक के सामने ही बनाते हैं, पहले बिसलेरी का पानी डालते हैं और फिर दूध, ताकि ग्राहकों का विश्वास हो जाए। हमने समोसा का मैदा तैयार करने में भी फिल्टर पानी मंगाना शुरू किया है। पहले जहां बिसलेरी के दो कैरेट लगते थे अब 12 से 15 कैरेट की खपत हो रही है। कोई पानी पीने भी आता है तो हम बिसलेरी की बॉटल ही देते हैं और चाय में भी उसी का उपयोग करते हैं। एक होटल संचालक राम कुमार ने बताया, ‘मैं 7 साल से यहां होटल चला रहा हूं। हमेशा नल के पानी से ही चाय बनाई, लेकिन अब माहौल बहुत खराब है। प्रशासनिक दावे और जमीनी हकीकत
ऐसी बात नहीं है कि प्रशासन ने स्थिति को नियंत्रित करने का प्रयास नहीं किया। क्षेत्र में पानी की किल्लत न हो, इसके लिए 40 से अधिक टैंकर लगाए गए हैं। जिन संकरी गलियों में टैंकर नहीं पहुंच सकते, वहां बड़े टैंक रखवाए गए हैं। लोगों में विश्वास जगाने के लिए स्वयं कलेक्टर ने सबके सामने टैंकर का पानी पीकर दिखाया, लेकिन उनके इस कदम का भी कोई ख़ास असर होता नहीं दिख रहा है। लगातार होती मौतें और हर दिन सामने आते नए मरीजों ने लोगों के मन में ऐसी दहशत भर दी है कि वे अब किसी भी सरकारी आश्वासन पर भरोसा करने को तैयार नहीं हैं। वे टैंकर के पानी का उपयोग बर्तन धोने, कपड़े धोने और अन्य साफ-सफाई के कामों में तो कर रहे हैं, लेकिन उसे पीने या खाना बनाने में इस्तेमाल करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे। ये खबर भी पढ़ें…
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