ग्राम सोंहपुर में तीन दिवसीय पांच कुंडीय गायत्री महायज्ञ एवं प्रज्ञापुराण कथा का समापन हुआ। पहले दिन मंगल कलश यात्रा निकाली गई। पीतवस्त्रधारी महिलाओं ने सिर पर कलश धारण कर भजन एवं प्रज्ञा गीत गाते हुए पूरे ग्राम का भ्रमण किया। शोभायात्रा तालाब पहुंची, जहां जल वरुण देवता का विधिवत पूजन किया गया। गायत्री परिवार के प्रज्ञापुत्र राजेन्द्र कुमार सिन्हा ने कहा कि जल की उत्पत्ति यज्ञ से ही होती है। यज्ञीय आयोजन से वातावरण प्रदूषण मुक्त होता है, भावनाएं शुद्ध होती हैं। वायु और जल में शुभ गंध व्याप्त होती है। उन्होंने कहा कि यज्ञ से मानव के भीतर स्वार्थ भाव समाप्त होकर प्रेम, सेवा और निष्काम कर्म की प्रवृत्ति विकसित होती है। क्योंकि यह व्यक्ति को अपने से ऊपर उठकर समाज और समस्त विश्व के कल्याण के लिए कार्य करने की प्रेरणा देता है, जो कि भगवद्गीता के कर्मयोग का सार है। यह कर्मफल की आसक्ति को त्यागकर कर्तव्य भाव से किए गए कार्य हैं, जिससे मन शुद्ध होता है और आध्यात्मिक उन्नति होती है। जब व्यक्ति यज्ञ के भाव से कर्म करता है, तो वह स्व के बजाय सर्व का कल्याण देखता है, जिससे स्वार्थ का स्थान प्रेम और परोपकार ले लेते हैं। यज्ञ के माध्यम से व्यक्ति मैं और मेरे से हम की भावना में आता है, जिससे दूसरों के प्रति सहानुभूति, करुणा और सेवाभाव जागृत होता है। यज्ञ केवल व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे संसार का कल्याण करता है, क्योंकि देवताओं को संतुष्ट करके वे लोक-कल्याण के लिए प्रवृत्त होते हैं। प्रज्ञापुराण कथा के दौरान सद्बुद्धि का संदेश दिया सायंकालीन प्रज्ञापुराण प्रवचन में कथाकार मीता ठक्कर ने प्रज्ञावतार के महत्व को बताया। उन्होंने कहा कि वर्तमान युग में भगवान प्रज्ञा (सद्बुद्धि व विवेक) के रूप में अवतरित हुए हैं, जिनके सूत्रधार युगदृष्टा पं. श्रीराम शर्मा आचार्य हैं। उन्होंने बताया कि आचार्य द्वारा रचित तीन हजार से अधिक जीवनोपयोगी साहित्य के स्वाध्याय से व्यक्ति, परिवार और समाज का नवनिर्माण संभव है। प्रज्ञावतार का महत्व युग-परिवर्तन के लिए ज्ञान के जागरण और व्यक्ति- समाज- विश्व के कायाकल्प में है, जहां निराकार दिव्य शक्ति वरिष्ठ आत्माओं में चेतना भरती है।


