उदयपुर विकास प्राधिकरण (यूडीए) की कार्यशैली पर न्यायालय ने सख्त नाराजगी जताई है। दो साल तक कोर्ट के आदेशों की पालना नहीं करने पर अतिरिक्त सिविल कोर्ट-1 (उत्तर) ने यूडीए सचिव की कुर्सी 23 फरवरी से पहले कुर्क करने के आदेश दिए हैं। आदेश की पालना होने के बाद ही सचिव को कुर्सी वापस मिलेगी। प्रकरण के अनुसार पायड़ा निवासी शांतिलाल बापना, महेश आचार्य, हरीश भट्ट, कुसुम पालीवाल और हरिशंकर नागदा ने 23 अप्रैल 2024 को यूडीए सचिव के खिलाफ स्थायी निषेधाज्ञा का प्रार्थना पत्र पेश किया था। परिवादी श्रीनाथ कॉलोनी में रहते हैं, जहां यूआईटी (अब यूडीए) के स्वीकृत प्लान में आराजी नंबर 541 और 542 के बीच 20 फीट चौड़ी सड़क प्रस्तावित थी। इसी भूमि पर नंदलाल पालीवाल ने कृषि भूमि पर अवैध निर्माण कर लिया, जिससे कॉलोनी के गंदे पानी की निकासी बाधित हो गई। शिकायत पर यूडीए ने निर्माण हटाने के आदेश दिए, लेकिन आरोप है कि कर्मचारियों की मिलीभगत से सड़क की चौड़ाई 20 फीट से घटाकर 10 फीट कर प्लान स्वीकृत करवा लिया गया। न तो अवैध निर्माण हटाया गया और न ही नाली बनाई गई। सिविल कोर्ट ने 1 जून 2024 को आराजी 541 और 542 के बीच 109 फीट लंबी नाली तीन माह में बनाने के निर्देश दिए थे, जिनकी पालना अब तक नहीं हुई। यूडीए ने कहा- मकान बिक चुका, डिक्री जरूरी नहीं
यूडीए की ओर से आरआई प्रताप सिंह राणावत ने तर्क दिया कि नंदलाल मकान बेच चुका है, इसलिए डिक्री की पालना जरूरी नहीं है। दूसरे पक्ष ने बिक्री की पुष्टि की, लेकिन कोर्ट ने कहा कि इससे पालना याचिका अपोषणीय नहीं होती। परिवादियों ने 8 जुलाई 2024 को हकरसी प्रार्थना पत्र दायर किया। यूडीए ने 6 नवंबर 2024 को जवाब दिया कि पानी नाली से निकल रहा है, इसलिए तोड़फोड़ नहीं की गई। कोर्ट ने इसे आदेश की पालना नहीं माना। जज रवींद्र सोलंकी ने अवमानना मानते हुए सचिव की कुर्सी कुर्क करने और वारंट जारी करने के आदेश दिए। अगली सुनवाई 23 फरवरी को होगी। कोर्ट आदेश की प्रभावी पालना तय करना उद्देश्य जब कोई सरकारी अधिकारी या विभाग न्यायालय के आदेशों की पालना नहीं करता, तो अदालत सिविल प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) के तहत उसकी अचल संपत्ति कुर्क करने का अधिकार रखती है। अधिकारी की कुर्सी को प्रतीकात्मक रूप से अचल संपत्ति मानकर कुर्क किया जाता है। इसका उद्देश्य दंड देना नहीं, बल्कि आदेशों की प्रभावी पालना सुनिश्चित करना है। अधिवक्ता बंशीलाल गवारिया के अनुसार कोर्ट मुंसरीम संबंधित कार्यालय में जाकर कुर्सी पर कुर्की आदेश चस्पा करता है और कार्रवाई रिकॉर्ड में दर्ज होती है। इसके बाद अधिकारी कुर्सी पर बैठकर आधिकारिक काम नहीं कर सकता, जिससे विभागीय कामकाज प्रभावित होता है। कुर्की के बावजूद काम करना अवमानना माना जाएगा, जिस पर अदालत कठोर कार्रवाई कर सकती है। आदेशों की पालना होने पर कुर्की हटाई जाती है और अधिकारी पुनः कार्यभार संभाल सकता है।


