उदयपुर में सिटी पैलेस म्यूजिम और इलाहाबाद म्यूजिम के संयुक्त तत्वाधान में प्रेमार्पण प्रदर्शनी का आगाज हुआ। उत्तरप्रदेश की राज्यपाल आनंदी बेन पटेल ने पैलेस के फतेह निवास गैलरी में इसका उद्वाटन किया। इस मौके पर राज्यपाल पटेल ने स्कूली बच्चियों को संबोधित करते हुए मन से पढ़ाई करने और मोबाइल से दूर रहने की हिदायत भी दी। उन्होंने कहा कि आस्ट्रेलिया जैसे विकसित देश भी मोबाइल को बंद कर दिया गया है। भारत में भी अब पेरेन्ट्स को अपने बच्चों से मोबाइल बचाने की जरूरत है। उन्होंने प्रदर्शनी में पेटिंग्स देखकर मेवाड़ के महाराणाओं की कला के प्रति गहरी रूचि पर खुशी जताई। इस मौके पर उत्तरप्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने कहा कि बच्चियों की शिक्षा पर सबसे पहले गुजरात सरकार ने काम किया था। यूपी में राज्यपाल बनने के बाद ऐसे कई उदाहरण देखने को मिले है, जहां बच्चियां अपने घर को छोड़कर किसी के साथ चली गई ह, वे अब काफी परेशान रहती है। इस दौरान आनंदीबेन पटेल ने सरकारी स्कूल की बालिकाओं को स्मृति चिह्न भेंट किये। उन्होंने कहा कि ये चित्र मात्र आकृतियां ही नहीं बल्कि उस काल में महाराणाओं और उन कलाकारों की भावनाएं है, जिन्हें चित्रों के माध्यम से जीवंत भाव भरें हुए है। मेवाड़ ने बताया कि यह भारतीय चित्रकला के एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक अध्याय को उद्घाटित करती है। प्रेमार्पण दो गूढ़ शब्द प्रेम और समर्पण अर्थात अर्पण का काव्यमय संगम है। ये भाव भक्ति, निःस्वार्थता और आत्मसमर्पण की आंतरिक अवस्थाओं को अभिव्यक्त करते हैं। इस प्रदर्शनी में इन्हीं भावनाओं को पौराणिक कथाओं, लोक कथाओं और मेवाड़ के महाराणाओं के जीवन प्रसंगों के माध्यम से उकेरा गया है, जो उनके अमर प्रेम और समर्पण को उजागर करते हैं। यह प्रदर्शनी 18वीं से 20वीं शताब्दी तक के उत्कृष्ट चित्रों को एक साथ प्रस्तुत करती है। चित्रों की यह प्रदर्शनी 15 जून तक दर्शकों के लिए खुली रहेगी। पूर्व राजपरिवार सदस्य लक्ष्यराजसिंह मेवाड़ ने बताया कि इलाहाबाद संग्रहालय ने 48 तथा सिटी पैलेस संग्रहालय, उदयपुर ने 36 मेवाड़ शैली के ऐसे चित्र साझा किए हैं, जिनमें 18वीं सदी ईस्वी से लेकर 21वीं सदी के कलाकारों द्वारा रचित भगवान श्रीकृष्ण और राधा जी के प्रेम भाव तथा ढोला मारू की कथाओं के माध्यम से प्रेम और समर्पण की भावनाओं का सशक्त चित्रण किया गया है। प्रदर्शनी में रसिकप्रिया, बिहारी सतसई, गीत गोविंद और सूरसागर के पृष्ठों पर आधारित थीम्स भी शामिल हैं। प्रसिद्ध मेवाड़ विद्यालय की सूक्ष्म चित्रकला 17वीं सदी ईस्वी से आगे कई पीढ़ियों के महाराणाओं के संरक्षण में फली-फूली, जिनकी उत्कृष्टता की निरंतर साधना इन दुर्लभ चित्रों में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।


