ये टाल-मटोल क्यों? 2 किमी. सड़क की फाइल डेढ़ साल से मंत्री के पास; इसलिए लोग हर माह 9.90 करोड़ टोल दे रहे

लुधियाना से नवांशहर, गढ़शंकर, बलाचौर, बंगा, होशियारपुर, ऊना समेत लोअर हिमाचल जाने का अभी एकमात्र रास्ता एनएच-44 है। क्योंकि, इन शहरों को जाने वाली राहों रोड का 2 किमी. का हिस्सा बन नहीं पाया है। रास्ते में बिजली के खंभे हैं, जिन्हें हटाने के लिए पीडब्ल्यूडी ने बिजली विभाग (पावरकॉम) को डेढ़ साल पहले पत्र भेजा। पावरकॉम ने खंभे शिफ्ट करने से इनकार कर दिया। उसके बाद पीडब्ल्यूडी ने दोबारा फाइल बनाकर भेजी। दोनों विभागों ने इस संबंध में मंत्री को भी अवगत कराया। मंत्री ने फाइलें मंगा लीं, लेकिन अभी तक मंजूर नहीं की हैं। दोनों विभागों के मंत्री एक ही हैं- हरभजन सिंह ईटीओ। अगर ये फाइल मंजूर कर लेते तो सड़क बनाने में करीब 3 महीने लगने थे। मंत्री ने फाइल मंजूर क्यों नहीं की? इसका जवाब पाने के लिए भास्कर ने मंत्री से बात करने के 30 प्रयास किए। 5 बार बात भी हुई। उन्होंने हर बार कहा कि जल्दी जवाब देता हूं। एनएचएआई के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, एनएच-44 से रोज गुजरने वाले 40 हजार वालों में 25%, यानी 10 हजार नवांशहर, गढ़शंकर, बलाचौर, बंगा, होशियारपुर आदि आते-जाते हैं। राहों रोड बन जाता तो इन्हें टोल वाली रोड से नहीं गुजरना पड़ता। इन्होंने हर महीने औसतन 9.90 करोड़ रु. टोल दिया। एक तरफ का टोल 230 रु. और दोनों तरफ का 330 रु. है। एनिमल अंडरपास का काम भी धीमा, इससे भी प्रोजेक्ट थोड़ा और अटक सकता है ये राहों रोड, जिसका सिर्फ 2 किमी. हिस्सा नहीं बना है अभी इस रोड से जाना पड़ता है, जिसमें टोल लगता है मत्तेवाड़ा जंगल में सड़क का काम शुरू किया गया था। बस इस रोड को पक्का किया जाना बाकी है। फोटो : कंवलदीप डंग मत्तेवाड़ा फिल्लौर टोल प्लाजा नवांशहर खंभे शिफ्ट करने की मंजूरी मिल जाती तो ये सड़क सवा साल पहले ही बनकर तैयार हो जाती। अब अगर मंत्री इसे तत्काल मंजूरी दे देते हैं तो भी इसे बनने में समय लगेगा। क्योंकि, अब इसी जगह जानवरों के गुजरने के लिए एनिमल अंडरपास बन रहा है। यह केंद्र का प्रोजेक्ट है। मौके पर मौजूद इंजीनियरों का कहना है कि इसमें छह महीने और लग सकते हैं। लुधियाना से नवांशहर जाना हो तो लाडोवाल टोल प्लाजा होते हुए फिल्लौर से 53 किमी. का रास्ता पड़ता है, जबकि लुधियाना से राहों-मत्तेवाड़ा रोड से रास्ता 43 किमी का रह जाता है। यानी, रोड बन जाने से 330 रु. तो बचेंगे ही 10 किमी का सफर भी कम होगा। इस सड़क पर बीच में सिर्फ 11.3 किमी का पैच था। करीब 9 किमी सड़क बन गई। उसके बाद काम ठप है। इस सड़क पर कुल 43 करोड़ रु. खर्च होने हैं। कॉन्ट्रेक्टर ने मत्तेवाड़ा जंगलों के ठीक पास काम छोड़ रखा है। उसे पावरकॉम से मंजूरी नहीं मिल रही। मंत्री से 5 बार बात की गई, जवाब एक बार भी नहीं दिया मंत्री ने मिलने का समय नहीं दिया। 5 बार बात जरूर की। 6 मार्च को उन्होंने सवाल मंगा लिए, जिनके जवाब नहीं आए हैं। ये हैं सवाल? {सड़क से जुड़ी फाइल डेढ़ साल से आपके पास है। क्यों अटका रखी है? {सड़क के लिए बिजली के खंभे पहले भी शिफ्ट होते रहे हैं, तो फिर यहां देरी क्यों? {लोग हर महीने औसतन 9.90 करोड़ रु. टोल इसलिए दे रहे हैं, क्योंकि सिर्फ 2 किमी सड़क नहीं बनी। इससे एनएच-44 पर टोल प्लाजा कंपनी को सीधा फायदा पहुंच रहा है। लोगों का नुकसान को रोकने में देरी क्यों? {फाइल में तकनीकी खामी भी नहीं है। दोनों विभागों के अफसर कहते हैं कि मंत्री की तरफ से निर्देश आए तो आज काम शुरू हो सकता है। तो फिर किस बात का इंतजार है?

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