दक्षिण भारत का एक मशहूर जायका है बिरयानी… नाम आपने भी सुना होगा। हो सकता है कई लोगों ने स्वाद भी चखा हो। शताब्दियों पुरानी इसी पाक शैली में राजस्थान की एक रॉयल डिश भी तैयार होती है। जोधपुरी काबुली। राजस्थानी गट्टे, ब्रेड के टुकड़े, पनीर, केसर, ड्राई फ्रूट, बासमती चावल और कई तरह की सब्जियों की लेयर से बनने वाली जोधपुरी काबुली का स्वाद में कोई मुकाबला नहीं। मारवाड़ की शाही दावतों में इसे बड़ी शान से परोसा जाता था। आज जोधपुर में सैकड़ों रेस्टोरेंट, पांच सितारा होटलों के मेन्यू में ये शामिल है। यूं तो जोधपुरी काबुली बनाने की शैली एक जैसी ही है। लेकिन एक खास शॉप है, जहां इसे देसी घी और दूध में तैयार किया जाता है। यहां जोधपुरी काबुली का स्वाद चखने के लिए लोगों को सप्ताह भर इंतजार करना पड़ता है। तो चलिए राजस्थानी जायका की इस कड़ी में आपको भी लेकर चलते हैं, इस मशहूर ठिकाने पर… रेसिपी के नाम में ही इसकी शुरुआत की कहानी छिपी है। यह अफगानिस्तान की डिश काबुली बिरयानी का वेजिटेरियन रूप मानी जाती है। इतिहासकारों के मुताबिक 17-18वीं शताब्दी में अफगानिस्तान के काबुल से व्यापारी काजू, अखरोट, किशमिश, चिरौंजी जैसे सूखे मेवे लेकर मारवाड़ में व्यापार करने आते थे। तब सूखे मेवों के सबसे बड़े खरीददार शाही घराने और सेठ-साहूकार ही होते थे। शाही घरानों के रसोइए दावतों के लिए हमेशा नए प्रयोग करते थे। तब दक्षिण भारत में अफगानिस्तान की चिकन बिरयानी से मिलती-जुलती हैदराबादी बिरयानी का चलन ज्यादा था।उसी बिरयानी के लेयर फॉर्मूले का इस्तेमाल कर काबुल के मेवों का बासमती के चावलों के प्रयोग से ही जोधपुरी काबुली बनाई गई थी। हालांकि इस बात के कोई पुख्ता प्रमाण नहीं हैं, कि जोधपुरी काबुली को पहली बार किसने या कब बनाया गया था। जोधपुरी काबुली है क्या? इसे पाक कला की बिरयानी शैली में बनाया जाता है। हैदराबादी बिरयानी में चावल के साथ मांस का इस्तेमाल होता है। लेकिन जोधपुरी काबुली में चावल और सब्जियों को अलग-अलग पकाते हैं। फिर एक भारी तल वाले बर्तन में चावल की लेयर बनाकर सब्जियां भरी जाती हैं। फिर इसे दम देकर पकाते हैं। राजस्थान की ये ट्रेडिशनल शाही डिश किसी शाकाहारी पुलाव या शाकाहारी बिरयानी जैसी दिखती है। लेकिन स्वाद ऐसा कि अंगुलियां चाटने को मजबूर हो जाएं। जोधपुरी काबुली में डीप फ्राई की गई मिक्स सब्जियों, राजस्थानी गट्टे, काजू-बादाम जैसे सूखे मेवे होते हैं। इसे बनाने में कई घंटों की मेहनत लगती है। पूर्व राजघरानों के रसोइए खटास के लिए काबुली को दही के बेस में बनाते थे। आज भी जोधपुर के ज्यादातर रेस्टोरेंट पर यह डिश दही में ही तैयार की जाती है। लेकिन इसी डिश को जोधपुर की पोकर स्वीट होम के पोकर राम भाटी ने कई प्रयोग किए। काबुली को दही की बजाय दूध और देसी घी में तैयार किया। उस स्वाद को जिसने भी चखा, दीवाना बन गया। इसे खाने के लिए बुकिंग भी एडवांस करवानी पड़ती है। मजदूर से बने हलवाई, काबुली बनाई तो खाने वालों की लगी भीड़ पोकर स्वीट होम के ओनर आनंद भाटी (62) ने बताया कि उनके पिता पोकर राम भाटी पूर्व में कमठा मजदूरी का काम करते थे। दिनभर की मेहनत के बाद भी कुछ बचा नहीं पाते थे। परिवार चलाने के लिए उन्होंने नमकीन बेचने का स्टॉल लगाई। ग्राहक बढ़ने लगे तो किराए पर दुकान ली। धीरे-धीरे मिठाइयां भी तैयार करने लगे। यहां पर कुछ यूनिक खिलाने का सोचकर 1962 में काबुली बनाने पर कई एक्सपेरिमेंट किए। आनंद भाटी ने बताया कि उनके पिता ने ही जोधपुर में सबसे पहले देसी घी में काबुली तैयार की। उनकी बनाई काबुली की दूसरी खास बात ये थी कि वो दही की बजाय दूध में तैयार करते। इससे काबुली में क्रीमी टेस्ट बना। धीरे-धीरे खाने के शौकीनों की भीड़ बढ़ने लगी। काबुली फेमस हो गई। पहले इसी जगह पर वो एक केबिन में मिठाइयां बेचते थे। बाद में उन्होंने यही पर एक दुकान खरीद ली। जिसका नाम पोकर स्वीट होम रखा। कोयले की भट्टी पर बनाते हैं काबुली, मां तैयार करती हैं मसाले आनंद भाटी ने बताया कि इस काबुली की खास बात यह है कि मॉडर्न जमाने में भी हम ट्रेडिशनल तरीके से बनाते हैं। लकड़ी और कोयले की भट्टी पर ही पूरा जायका तैयार किया जाता है। काबुली में डलने वाले मसाले ही इसकी महक और स्वाद को बढ़ाते हैं। पिता के समय भी मां घर पर पीसकर मसाले बनाती थी। आज भी वे 84 साल की होने के बावजूद घर पर ही मसाले तैयार करके देती हैं। यही कारण है कि 6 दशक बाद भी उनकी काबुली का वही स्वाद बरकरार है। आगे बढ़ने से पहले देते चलिए आसान से सवाल का जवाब ऐसे बनाते हैं जोधपुरी काबुली कबुली को बनाने के लिए सबसे पहले देसी घी काम में लिया जाता है। इसके बाद एक बर्तन में दूध लेकर उसमें हल्दी और मिर्च डाली जाती है। जिसे लहसुन के छौंक के साथ घी में पकाया जाता है। करीब डेढ़ घंटे तक इसी तरह से मसाला पकाया जाता है। इससे क्रीमी टेस्ट वाली ग्रेवी तैयार होती है। सप्ताह में केवल एक दिन, करनी पड़ती है एडवांस बुकिंग पोकर की स्पेशल काबुली खानी हो तो पूरे सप्ताह का इंतजार करना पड़ता है। आनंद भाटी ने बताते हैं लंबे इंतजार के पीछे हमारी कोई मार्केटिंग स्ट्रेटजी नहीं हैं। असली कारण यह है कि काबुली बनाने में 4 घंटे लंबा वक्त लगता है। कम से कम 4 लोगों की टीम चाहिए होती है। स्वाद के साथ समझौता नहीं है इसलिए सप्ताह में केवल एक ही बार शनिवार को मैनपॉवर मैनेज कर पाते हैं। दूसरा वीकेंड पर लोग ज्यादा डिमांड करते हैं। इसलिए केवल शनिवार को सुबह 10 बजे से रात 10 बजे तक 12 घंटे के लिए काबुली बेची जाती है। उस दिन इतनी भीड़ पड़ती है कि दिन में तीन बार कबुली बनानी पड़ती है। एक किलो काबुली की कीमत 400 रुपए है। पिछले राजस्थानी जायका में पूछे गए प्रश्न का सही उत्तर ये है सांभर की फेमस फीणी, जो खासतौर से मकर संक्रांति के मौके पर बनाई जाती है। जयपुर से लगभग 80 किमी दूर सांभर की पहचान केवल नमक और खारे पानी की झील से ही नहीं यहां की फीणी से भी है। सांभर की फीणी सैकड़ों साल पुराना जायका है। सम्राट पृथ्वीराज चौहान की शादी में शाही भोजन के दौरान मेहमानों को यही मिठाई परोसी गई थी। इसे बनाने में मैथ्स का एक फॉर्मूला भी लगता है, तभी जाकर एक फीणी में 1296 महीन तार बनते हैं। पतली-पतली तारों जैसी बनने वाली ये फीणी एक खास क्लाइमेट में ही तैयार होती है…(CLICK कर पूरा पढ़िए…)


