गढ़वा| कला एवं साहित्य की अखिल भारतीय संस्था संस्कार भारती के झारखंड प्रांत के मंत्री नीरज श्रीधर स्वर्गीय ने कहा कि पंचम वेद के रूप में प्रसिद्ध नाट्यशास्त्र के प्रणेता आचार्य भरतमुनि के अनुसार रंगकर्म सृष्टि का सबसे पवित्र कर्म है। जो भी हृदय से रंगकर्म को आत्मसात् करता है उसका आहार और विहार भी अत्यंत सात्विक होता है। उसकी प्रत्येक प्रस्तुतियां “सा कला या विमुक्तये” को केंद्र में रखकर ही संपन्न होती हैं। उन्होंने कहा कि पहले गांव में जब पौराणिक नाटक, रामलीला आदि का आयोजन होता था तो उसमें गांव के किशोर, युवा और वृद्ध उसकी तैयारी में महीनों पूर्व लग जाते थे। जिन पात्रों का अभिनय करना होता था उनके चरित्र को अपने अंदर महसूस करने की चेष्टा करते थे। इससे नाट्य मंचन में गुणवत्ता के साथ उनके अंदर सुसंस्कार का संचरण भी स्वतः होने लगता था।


