रमजान उल मुबारक रहमत, मगफिरत और निजात का पैगाम लाता है : तौकीर अहमद

भास्कर न्यूज | गढ़वा शहर के जामा मस्जिद इराकी मोहल्ला इंतजामिया कमेटी के सेक्रेटरी तौकीर अहमद ने कहा है कि मुसलमानों का पवित्र महीना रमजान उल मुबारक रहमत, मगफिरत और निजात का पैगाम लेकर आता है। इस मुबारक महीने को इस्लामी परंपरा के अनुसार तीन अशरों (दस-दस दिनों के हिस्सों) में बांटा गया है। वहीं हर अशरे की अपनी अलग खासियत और फजीलत बताई गई है। उन्होंने कहा कि इन तीनों अशरों में इबादत का सवाब कई गुना बढ़ा दिया जाता है। इसलिए रोजेदार इन दिनों में ज्यादा से ज्यादा इबादत, तिलावत और दुआ का एहतमाम करते हैं। उन्होंने कहा कि रमजान का पहला अशरा रहमत का होता है। इसे अल्लाह की विशेष कृपा और दया का समय माना जाता है। इस दौरान बंदे पर अल्लाह की रहमतें बरसती हैं। रोजेदार पांचों वक्त की नमाज के साथ-साथ तरावीह की नमाज अदा करते हैं और कुरआन पाक की तिलावत में मशगूल रहते हैं। मस्जिदों में इबादत का खास माहौल देखने को मिलता है। उन्होंने कहा कि इस अशरे में बंदा सच्चे दिल से तौबा कर ले तो अल्लाह की रहमत उसके गुनाहों को ढक लेती है। दूसरा अशरा मगफिरत का होता है। यह गुनाहों की माफी का समय माना गया है। इस दौरान रोजेदार अपने पिछले गुनाहों की माफी मांगते हैं और ज्यादा से ज्यादा इस्तिगफार पढ़ते हैं। हदीसों में आता है कि जो शख्स रमजान में ईमान और एहतिसाब के साथ रोजा रखता है। उसके पिछले गुनाह माफ कर दिए जाते हैं। इसलिए इस अशरे में इबादत का जज्बा और भी बढ़ जाता है। मस्जिदों में तकरीर और बयान के जरिए लोगों को नेक अमल की तरफ प्रेरित किया जाता है। तीसरा और अंतिम अशरा निजात का होता है। इसे जहन्नम से छुटकारे का समय बताया गया है। इस रात में की गई इबादत का सवाब हजार महीनों की इबादत से ज्यादा बताया गया है।

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