रविशंकर शुक्ल का बीसवीं सदी के प्रारंभ से रहा दबदबा:छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद एक साथ चुनाव हार गया पूरा शुक्ल परिवार

छत्तीसगढ़ की राजनीति में रविशंकर शुक्ल का दबदबा बीसवीं सदी के प्रारंभ से ही रहा है। पंडित शुक्ल 1921 में रायपुर जिला पंचायत के सदस्य और फिर 1922 से लेकर 1937 तक उसके अध्यक्ष रहे। बाद में वे 1936 में मध्यप्रांत और बरार के शिक्षा मंत्री, फिर 1937 में मुख्यमंत्री बने। वे अलग-अलग चरणों में मध्यप्रांत और बरार के 1947 तक मुख्यमंत्री रहे। देश के आजाद होने पर वे ही पुनः मुख्यमंत्री बने और 1956 में नया मध्यप्रदेश बनने पर उसके भी मुख्यमंत्री रहे। दिलचस्प बात यह है कि इस दौरान उनके सबसे बड़े बेटे अंबिकाचरण शुक्ल 1946 से 1950 तक संविधान निर्मात्री सभा के सदस्य रहे और दूसरे नंबर के बेटे भगवतीचरण शुक्ल 1952 से 1957 तक संसद सदस्य रहे। दिसंबर 1956 में रविशंकर शुक्ल के आकस्मिक निधन के बाद 1957 में होने वाले चुनावों में उनके चौथे बेटे श्यामाचरण शुक्ल को विधानसभा और सबसे छोटे बेटे विद्याचरण शुक्ल को लोकसभा की टिकट दी गई और वे चुने भी गए। इसके बाद कई दशकों तक श्यामाचरण शुक्ल मध्यप्रदेश की राजनीति में अग्रणी भूमिका निभाते रहे। उधर, विद्याचरण शुक्ल केन्द्र की राजनीति में क्रमशः शक्तिशाली बनते गए।
वरिष्ठ नेताओं की आंख की किरकिरी बने रहे शुक्ल बंधु
इस तरह यह माना जाने लगा कि मध्यप्रदेश और विशेषकर छत्तीसगढ़ की राजनीति शुक्ल बंधुओं के आसपास चलती है। इसी वजह से श्यामाचरण और विद्याचरण दोनों नेता कांग्रेस के अन्य वरिष्ठ नेताओं की आंख की किरकिरी भी बने रहे। श्यामाचरण शुक्ल को 1999 में महासमुंद से संसद सदस्य चुना गया तो उनके द्वारा खाली की गई राजिम की विधानसभा सीट से 2000 के उपचुनाव में श्यामाचरण शुक्ल के बेटे अमितेश शुक्ल विधायक चुने गए। जब 2000 में छत्तीसगढ़ राज्य बना तो मुख्यमंत्री अजीत जोगी के मंत्रिमंडल में अमितेश शुक्ल पंचायत मंत्री बन गए थे।
राजिम से पहला ही विधानसभा चुनाव हार गए अमितेश
छत्तीसगढ़ के अलग राज्य बनने के बाद पहला विधानसभा चुनाव 2003 में हुआ। विधानसभा के चुनाव में अमितेश शुक्ल राजिम विधानसभा से चुनाव हार गए। इसी साल कुछ माह बाद लोकसभा के चुनाव हुए। इस चुनाव में दिलचस्प बात यह रही कि श्यामाचरण शुक्ल को कांग्रेस ने रायपुर लोकसभा क्षेत्र से टिकट दी और उधर विद्याचरण शुक्ल को भाजपा ने महासमुंद लोकसभा क्षेत्र से टिकट दी। श्यामाचरण शुक्ल के सामने भाजपा के रमेश बैस थे, तो विद्याचरण शुक्ल के सामने कांग्रेस के अजीत जोगी।
रमेश बैस और अजीत जोगी ने रोकी शुक्ल बंधुओं की रफ्तार
श्यामाचरण शुक्ल को रमेश बैस ने पराजित कर दिया। प्रदेश में भाजपा को 10 लोकसभा सीटों में 8 सीटें मिली किंतु भाजपा के उम्मीदवार विद्याचरण शुक्ल को अजीत जोगी ने हरा दिया। इस तरह छत्तीसगढ़ की राजनीति में 2003-04 में यह पहली बार हुआ कि शुक्ल परिवार का कोई भी सदस्य विधायक या सांसद नहीं रहा। और इसके बाद श्यामाचरण शुक्ल और विद्याचरण शुक्ल चुनावी राजनीति में कभी उबर नहीं सके। हां, अमितेश जरूर एक बार विधायक फिर बन थे लेकिन क्षेत्रीय और केन्द्रीय राजनीति में शुक्ल परिवार का वर्चस्व लगभग समाप्त हो गया।

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