रांची की मिट्टी में बसती है आजादी की महक:पहाड़ी मंदिर : देशभक्तों को जिस पेड़ पर फांसी दी गई, वह आज भी दे रहा क्रांति की गवाही

आज पूरा देश आजादी का त्योहार मना रहा है। अंग्रेजों से आजादी के 78 वर्ष पूरे हो चुके हैं। आजादी की इस लड़ाई में रांची सहित झारखंड की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। शहीदों की कुर्बानी से पूरा शहर गूंजा था, इसलिए रांची की मिट्टी में आजादी की महक उठती है। रांची और आसपास के इलाकों में स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास सिर्फ किताबों में नहीं, बल्कि आज भी पुरानी इमारतों, स्मारकों और पेड़ की डालियों में बसा है। रांची का पहाड़ी मंदिर ऐसा धार्मिक स्थल है, जहां देश में सबसे पहले तिरंगा फहराया जाता है। देशभक्तों को जिस पेड़ पर फांसी दी गई थी, वह आज भी क्रांति की गवाही दे रहा है। आइए जानते हैं रांची से जुड़ी यादें… पहाड़ी मंदिर में चार स्वतंत्रता सेनानियों को दी गई थी फांसी रांची पहाड़ी मंदिर को अंग्रेजों के शासनकाल में फांसी की टुंगरी के नाम से जाना जाता था, क्योंकि यहां आंदोलनकारियों को फांसी दी जाती थी। अंग्रेजों ने यहां चार स्वतंत्रता सेनानियों को फांसी दी थी। उनके सम्मान में यहां 14 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि से राष्ट्रीय तिरंगा फहराया जाता रहा है। यह विश्व का दूसरा ऐसा धर्मस्थल है, जहां राष्ट्रीय ध्वज को सम्मान के साथ फहराया जाता है। पहला वेटिकन सिटी है और दूसरा रांची का पहाड़ी मंदिर। जिस कदंब के पेड़ पर दी फांसी, वह आज भी सुरक्षित रांची के शहीद चौक के पास स्थित शहीद स्थल पर एक कदंब के पेड़ पर ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव को 16 अप्रैल 1858, पांडेय गणपत राय को 21 अप्रैल 1858 को इस पेड़ पर फांसी दी गई थी। इनके अलावा अंग्रेजों ने दर्जनों आंदोलनकारियों को यहीं पर फांसी दी थी। यह पेड़ आज भी रांची के म्यूजियम में सुरक्षित और संरक्षित कर रखा गया है, जो आज भी सुरक्षित है। बिरसा मुंडा कारागार बयां कर रहा आदिवासियों का संघर्ष बिरसा मुंडा कारागार अंग्रेजों के दमन व आदिवासियों के संघर्ष की कहानी कहता है। भगवान बिरसा मुंडा ने इसी जेल में 9 जून 1900 ई को अंतिम सांस ली थी। जेल भवन को संरक्षित रखने के लिए सरकार ने इसे संग्रहालय के रूप में विकसित किया है। टिकैत उमरांव सिंह व शेख भिखारी का बलिदान प्रेरणादायक अंग्रेजी हुकूमत के विरोध में 1857 की क्रांति में रांची के ओरमांझी में भी कई आंदोलनकारियों को फांसी दे दी गई थी। खटंगा के जमींदार टिकैत उमराव सिंह और उनके दीवान शेख भिखारी ने चुटूपालू घाटी में अंग्रेजों के सामान की आपूर्ति और आवागमन को रोक दिया था। इससे अंग्रेजों को काफी नुकसान हुआ था। अंग्रेजों ने 8 जनवरी 1858 को चुटूपालू घाटी में उनको फांसी दे दी थी। जिस स्थल पर उन्हें फांसी दी गई थी वह आज भी संरक्षित है। सरकार ने शहीद स्थल का सौंदर्यीकरण कराया है, ताकि भावी पीढ़ी उनके बलिदान को याद रखे। आड्रे हाउस : यहां हुई थी बापू-लेफ्टिनेंट गवर्नर वार्ता रांची का आड्रे हाउस करीब 150 वर्ष पुराना है। यह हाउस कई आंदोलनों में शांति स्थापित करने का गवाह बना है। संयुक्त बिहार-उड़ीसा राज्य के तत्कालीन लेफ्टिनेंट गर्वनर सर एडवर्ड अल्बर्ट गैट ने 4 जून 1917 को महात्मा गांधी से मुलाकात की थी। उन्होंने चंपारण के उत्तरी जिले में कृषि अशांति के समाधान के लिए वार्ता की थी।

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