रांची के 95 साल पुराने विश्वकर्मा मंदिर में होगी विशेष पूजा, भजनों की बहेगी गंगा

सिटी रिपोर्टर | रांची रांची के मेनरोड स्थित विश्वकर्मा लेन में झारखंड राज्य का सबसे पुराना और भव्य श्री जगतगुरु विश्वकर्मा भगवान का मंदिर है। विश्वकर्मा पूजा को लेकर यहां काफी तैयारियां की गई हैं। मंदिर में रांची समेत आसपास के जिलों से भी काफी संख्या में लोग श्रद्धा भक्ति से पूजा करने आते हैं। खास कर नए वाहन की पूजा के लिए भीड़ लगी रहती है। इस मंदिर में हर समाज के लोग पूजा करने आते हैं, जिनका व्यवसाय लोहा, लकड़ी, बर्तन, मिट्टी व घर के निर्माण सामग्री से संबंधित होता है। पूजा प्रभारी शंकर कुमार शर्मा ने कहा कि विश्वकर्मा भगवान का 95 साल पुराना मंदिर है, झारखंड में इतना भव्य विश्वकर्मा मंदिर कहीं नहीं है। भगवान विश्वकर्मा को सृष्टि में निर्माण व सृजन का देवता माना जाता है। इस मंदिर में जो भी व्यक्ति श्रद्धा भक्ति से मनोकामना व मन्नत मांगते हैं वह पूरी होती है। उन्होंने बताया कि वर्ष 1928 से पूर्व मोनी बाबा द्वारा विश्वकर्मा भगवान की तस्वीर रखकर पूजा करने की शुरुआत की गई, इसके बाद वर्ष 1930 मोनी बाबा की देखरेख में श्री विश्वकर्मा ब्राह्मण सभा, रांची द्वारा मंदिर की स्थापना की गई। मंदिर बनाने में अध्यक्ष बलदेव प्रसाद विश्वकर्मा व अन्य ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वर्तमान समय में मंदिर का संचालन श्री जगतगुरु विश्वकर्मा मंदिर न्यास समिति रांची द्वारा किया जाता है। जिसका पदेन अध्यक्ष अनुमंडल पदाधिकारी रांची व कार्यकारी अध्यक्ष वी. शिवनाथ है। विश्वकर्मा पूजा समिति में रामरतन शर्मा, शंकर शर्मा, शंकर विश्वकर्मा, रामजतन शर्मा, अजय विश्वकर्मा, जय प्रकाश शर्मा और भी अन्य सदस्यों द्वारा मंदिर को संचालित किया जा रहा है। मंदिर के मुख्य पुजारी पंडित राजाराम शास्त्री है। श्री जगद्गुरु विश्वकर्मा मंदिर न्यास समिति के पूजा प्रभारी ने बताया कि 17 सितंबर को पूजा 10 बजे सुबह शुरू होगी। भजन और भंडारा दोपहर 2 बजे से रात 9 बजे किया जाएगा। मेन रोड विश्वकर्मा मंदिर परिसर को सजाया जाएगा। भजनों की गंगा प्रवाह करने के लिए स्थानीय भजन मंडली भी शामिल होगी। रांची| पुष्य नक्षत्र और परिधि योग में 17 सितंबर को भगवान विश्वकर्मा की पूजा की जाएगी। भगवान विश्वकर्मा की जयंती कन्या संक्रांति के दिन मनाई जाती है जो आमतौर पर 17 सितंबर को पड़ती है। इसलिए हर साल 17 सितंबर को विश्वकर्मा पूजा की जाती है। एकादशी संक्रांति के साथ पुष्य नक्षत्र होने से कई गुणा अधिक महत्व हो गया है। कन्या संक्रांति को भगवान भास्कर कन्या राशि में आते हैं। इस दिन भगवान विश्वकर्मा को कई प्रकार के अस्त्र शस्त्र से सुशोभित किया जाएगा और विधिवत इनकी पूजा अर्चना की जाएगी। इस दिन भगवान विश्वकर्मा के साथ-साथ लोग अपने ऑफिस, कारखानों, दुकानों की मशीनों, औजारों और साथ ही अपने वाहनों की पूजा करते हैं। भगवान विश्वकर्मा ब्रह्म पुत्र हैं। सभी शिल्पकारों और वास्तुकारों के इष्टदेव हैं। इन्हें स्वयंभू और संसार का रचयिता माना जाता है। उन्होंने पवित्र द्वारका शहर का निर्माण किया, जहां श्री कृष्ण ने शासन किया था। उनका उल्लेख दिव्य बढ़ई के रूप में ऋग्वेद में किया गया है। उन्हें स्थापत्य वेद, यांत्रिकी और वास्तुकला विज्ञान का श्रेय दिया जाता है। ज्योतिष आचार्य प्रणव मिश्रा के अनुसार इस साल विश्वकर्मा पूजा पर कई मंगलकारी योग भी बन रहे हैं। कन्या संक्रांति और विश्वकर्मा पूजा के दिन शिव योग और शिववास योग का संयोग रहेगा। मान्यता है कि इन योगों में पूजा करने से हर मनोकामना पूरी होती है। सबसे अच्छी बात यह है कि इस दिन ही इंदिरा एकादशी का व्रत मनाया जाएगा, इसलिए भगवान विष्णु और शिल्पकारी विश्वकर्मा का एक साथ आने का संयोग बहुत ही दुर्लभ होगा।

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