राजनांदगांव से 765 तीर्थयात्री अयोध्या के लिए रवाना:विस अध्यक्ष डॉ रमन सिंह ने स्पेशल ट्रेन को दिखाई हरी झंडी; 13 जिलों के श्रद्धालु शामिल

विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह ने राजनांदगांव से 765 तीर्थयात्रियों को स्पेशल ट्रेन से अयोध्या के लिए रवाना किया। 6 अगस्त को रेलवे स्टेशन पर जयश्री राम के जयकारे और ढोल-मंजीरे की मंगल ध्वनि के बीच श्रद्धालुओं को विदा किया गया। बता दें कि दुर्ग और बस्तर संभाग के 13 जिलों के श्रद्धालु इनमें शामिल है। डॉ. रमन सिंह ने कहा कि आईआरसीटीसी की संपूर्ण सुविधायुक्त ट्रेन से श्रद्धालु अयोध्या जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि आज पहली बार बुजुर्गों को सामूहिक रूप से विदा करने के लिए लोग एकत्रित हुए हैं। उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति की इच्छा होती है कि वे धार्मिक स्थलों में जाकर ईश्वर के दर्शन कर सकें। सभी दर्शनार्थियों के चेहरे पर प्रसन्नता और खुशी देखी जा सकती थी। राज्य सरकार का जताया आभार डॉ. सिंह ने मुख्यमंत्री विष्णु देव साय को इस पहल के लिए धन्यवाद दिया। उन्होंने यह भी बताया कि राजनांदगांव के रेलवे स्टेशन का 6 करोड़ रुपए की लागत से जीर्णोद्धार किया जा रहा है। छत्तीसगढ़ पर्यटन बोर्ड के अध्यक्ष नीलू शर्मा ने इस अवसर को सौभाग्य का दिन बताया। श्रीरामलला दर्शन अयोध्या धाम योजना के अंतर्गत मुख्यमंत्री विष्णु देव साय श्रवण कुमार बनकर श्रद्धालुओं को अयोध्या धाम भेज रहे हैं। पहले यह ट्रेन रायपुर और दुर्ग रेलवे स्टेशन से ही रवाना होती थी। श्रीविनय कुशल मुनि जी का प्रवचन राजनांदगांव में जैन बगीचे के नए हॉल में जैन संत श्रीविनय कुशल मुनि जी के सुशिष्य एवं तपस्वी संत श्रीवीरभद्र विराग मुनि ने अपने प्रवचन में कहा कि मनुष्य जीवन में लेने जैसा कुछ है तो वह है संयम, छोड़ने जैसा कुछ है तो वह है संसार और पाने जैसा कुछ है तो वह है मोक्ष। उन्होंने कहा कि मनुष्य जन्म बहुरंगी है। यह आत्मा को परमात्मा बनाने का अवसर है। इस देह को एक दिन छोड़कर जाना पड़ेगा। इसलिए उससे पहले आत्मरमण कर हमें इसके रहस्य को जानना चाहिए।मुनिश्री ने बताया कि जब हम आत्म कल्याण के मार्ग पर बढ़ जाते हैं, तो शरीर की वेदना और राग-द्वेष का महत्व समाप्त हो जाता है। उन्होंने खान-पान शुद्ध रखने और सोच-समझकर दोस्ती करने की सलाह दी। प्रवचन में उन्होंने चिंता व्यक्त की कि वर्तमान समय में जीव हिंसा कई गुना बढ़ गई है। उन्होंने कहा कि हम रक्षक हैं, रक्षक को भक्षक नहीं बनना चाहिए। जीव हिंसा पाप है और इसका दुख भोगना ही पड़ेगा। मुनिश्री ने अंत में कहा कि मनुष्य शरीर मिला है तो इसका सदुपयोग करें और आराधना के माध्यम से मोक्ष की ओर बढ़ें। यह प्रवचन 7 अगस्त को आयोजित किया गया था।

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