राजस्थानी कलाकार नाराज:मेहमानों के सामने एयरपोर्ट गेट पर नाचने, स्वागत द्वारों पर सारंगी बजाने तक बांध दी हमारी कला… मंच दीजिए

पद्मश्री और प्रसिद्ध कालबेलिया नृत्यांगना गुलाबो सपेरा की आंखों में प्रश्नों के कई धनुष-बाण हैं। राजस्थान के कालबेलिया नृत्य को दुनिया से परिचित कराने वाली गुलाबो निराश होकर कहती हैं- 40 से अधिक देशों में मेरे नृत्य को सम्मान मिला है, मगर अपने ही राज्य में कांटे बिछाए जा रहे हैं। गुलाबो गुस्से में हैं। कारण- राजस्थान में होने वाले बड़े सरकारी कार्यक्रमों में मंच न मिलना। बातचीत करते-करते गुलाबो के दर्द का दायरा धीरे-धीरे खुलने लगता है। पीड़ा सुनिए- दिल्ली और दुनियाभर से जब भी बड़ा वीआईपी राजस्थान आता है तो हमें बुलाते हैं, मगर एयरपोर्ट गेट पर डांस के लिए। सरकारों ने कालबेलिया नृत्य को मेहमानों के स्वागत तक सीमित कर दिया। ग्रैमी अवॉर्ड विजेता पद्मभूषण पं. विश्वमोहन भट्‌ट का मन भी गुलाबो की तरह ही बेचैन है। बकौल भट्‌ट- सरकार ने राजस्थान के विश्व प्रसिद्ध कलाकारों से दूरी बना ली है। राजस्थान दिवस और राइजिंग राजस्थान जैसे बड़े सरकारी आयोजनों में नहीं बुलाना इसके सबूत हैं। ये सरकारी उपेक्षा परेशान करती है। लोक-कलाकारों की ये निराशाजनक प्रतिध्वनियां सिर्फ इन दो फनकारों तक सीमित नहीं हैं। पद्मविभूषण और पद्श्री से नवाजे गए राजस्थान के विश्व प्रतिष्ठित 11 से अधिक कलाकारों ने अफसरों के घृणास्पद व्यवहार को लेकर मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा को पत्र भी लिखा है। राजस्थान फोरम के मंच से लिखे इस पत्र में संस्कृति कर्मियों ने सीएम से मिलने का समय मांगा है, ताकि सरकारी उपेक्षा का दर्द बयां कर सकें। आठ पीढ़ियों से सारंगी वादन करने वाले पद्मश्री मोइनुद्दीन खान कहते हैं- सरकार से हमारा भावनात्मक रिश्ता खत्म होता जा रहा है। सारंगी को बचाने के लिए अकादमी बनानी चाहिए, लेकिन सरकारों को लगता है कि सारंगी, नीति बनाने से नहीं, स्वागत द्वारों पर धुन बजाने से बच जाएगी। मांड गायकी से दुनिया को दीवाना बनाने वाले पद्मश्री अली-गनी बंधु भी खुद को अपमानित महसूस करते हैं, जब अपने ही राज्य के अफसर उनकी पहचान पूछते हैं। वे कहते हैं- हमारे राज्य के अफसरों को हम नहीं, बॉलीवुड के चेहरे पसंद हैं। राजस्थानी कलाकारों के इस दर्द और गुस्से से सहमति-असहमति के पक्ष हो सकते हैं, लेकिन यह पीड़ा काबिलेगौर तो है ही। अपने ही प्रदेश में कलाकार खुद को उपेक्षित महसूस करें तो यह लोकोक्ति सिद्ध होती है… घर का जोगी जोगड़ा, आन गांव का सिद्ध…। ग्रैमी अवॉर्ड विजेता पं. विश्वमोहन भट्ट की सलाह- मप्र सरकार से सीखे राजस्थान “राजस्थान सरकार के अफसरों को हमारी उपलब्धियों का पता ही नहीं। उन्हें तो बॉलीवुड की समझ है। राइजिंग राजस्थान में जिस तरह बॉलीवुड को जगह दी गई, तो इवेंट का नाम राइजिंग बॉलीवुड ही रख देते। राजस्थान को मध्यप्रदेश के कला-संस्कृति विभाग से सीखना चाहिए, क्योंकि वहां 365 दिनों की कला-संस्कृति की प्लानिंग स्थानीय कलाकारों को केंद्र में रखकर होती है।” -पद्मभूषण पं. विश्वमोहन भट्‌ट, ग्रैमी अवॉर्ड विजेता व सभापति, राजस्थान फोरम “अपने ही राज्य में प्राेत्साहन नहीं मिलेगा तो कलाकार कैसे जिएगा? राइजिंग राजस्थान में बुलावा तक नहीं भेजा।”
–पद्मश्री मुन्ना मास्टर, भजन गायक “दुनिया हमारे काम को मंच दे रही है, लेकिन हम अपने राज्य–प्रांत में ही अछूत हैं।”
– पद्मश्री शाकिर अली, मिनिएचर आर्टिस्ट “हम चुप हैं और मप्र सरकार तानसेन जैसे फेस्टिवल जयपुर में कर रही है। स्थानीय कलाकार अन्य राज्यों में जा रहे हैं।” –इकराम राजस्थानी, गीतकार “राजस्थान में सारंगी हमारे घर से शुरू हुई। देश में सारंगी बजाने वाले 75% कलाकार हमारे परिवार से ही सीखे। बड़े सरकारी मंच पर हमारी सारंगी मौन है।” –पद्मश्री मोइनुद्दीन खान, सारंगी वादक “बॉलीवुड भी हमारी लोक गायकी का कायल है। बड़ी फिल्मों और बड़े मंचों पर मुझे जगह मिली। हम स्टेज के बादशाह अपने राज्य में फकीर हैं, मंच नहीं मिलता।” –पद्मश्री अनवर खान, विश्व विख्यात लोक गायक “हमें देश-दुनिया में मान–सम्मान मिलता है। हमें हमारे हिस्से का मंच चाहिए, जो मुंबई के ऐसे चेहरे ले जाते हैं, जिन्हें कोई जानता तक नहीं।”
–पद्मश्री गुलाबो, कालबेलिया नृत्यांगना “मांड गायकी को सरकार भूलने लगी है। हरियाणा, तेलंगाना में तो मांड गायकों को पेंशन मिल रही है। यहां तो सरकार अपने ही कार्यक्रमों में नहीं बुलाती।”
–पद्मश्री अली-गनी मोहम्मद, मांड गायक “इंदिरा गांधी तक हमारी कला देख हैरान थीं, जब मैंने खाने की टेबल पर प्लेट में मेटल की मक्खी रख दी थी। दुनिया में चर्चित रागमाला पेंटिंग अपने ही राज्य में अजनबी है।”
–पद्मश्री तिलक गिताई, स्कल्पचर आर्टिस्ट सीएम से मिलने का समय मांगा है “प्रदेश में कला-साहित्य-संस्कृति संकट से गुजर रही है। प्रमुख सांस्कृतिक कार्यक्रमों में सीमित प्रतिनिधित्व है, बड़े सरकारी कार्यक्रमों में भी नहीं बुलाते। सीएम से मिलने का वक्त मांगा है।” –संदीप भूतोड़िया, संस्थापक, राजस्थान फोरम

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