राजस्थान की राजधानी बनाने में रहा था असमंजस:जयगढ़ हैरिटेज फेस्टिवल में बोले इतिहासकार- जय सिंह ने शिवाजी को औरंगजेब की कैद से छुड़ाया था

जयगढ़ हेरिटेज फेस्टिवल 2025 का दूसरा दिन इतिहास के मुद्दे पर खासा सुर्खियों में रहा। राजस्थान एंड द सबकॉन्टिनेंट पॉलिटिक्स, पॉलिटी एंड द आर्ट ऑफ वॉर विषय पर सत्र में चर्चा हुई। इस चर्चा में जेएनयू के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. अभिमन्यु सिंह, इतिहासकार डॉ. रीमा हूजा, शोधकर्ता जिज्ञासा मीणा और इतिहासकार पंकज झा मौजूद रहे।
डॉ. रीमा हूजा ने कहा कि भारत की आजादी के बाद राजस्थान की राजधानी तय करने को लेकर गहरा असमंजस था। अंग्रेजों के पास पहले से अजमेर मुख्य प्रशासनिक केंद्र के रूप में काम कर रहा था, इसलिए उसे राजधानी बनाने का प्रस्ताव काफी मजबूत था।
जैसलमेर, जोधपुर, बीकानेर, उदयपुर रियासतों ने भी दावा किया। लेकिन राजनीतिक संतुलन और भौगोलिक-प्रशासनिक संरचना को देखते हुए आखिर में जयपुर को राजधानी चुना गया। उन्होंने कहा कि आज भी राजनीति में हर वर्ग को साथ रखने के लिए ऐसे ही बैलेंसिंग कदम उठाए जाते हैं। डॉ. हूजा ने कहा कि राजस्थान की राजनीतिक-सांस्कृतिक छवि में अनेक वर्गों और समुदायों का योगदान रहा है। उन्होंने मिर्जा राजा मानसिंह को याद करते हुए कहा कि मान सिंह के काबुल से लेकर बंगाल तक युद्ध और प्रशासनिक कौशल के निशान मिलते हैं। बंगाल, बांग्लादेश और उत्तर भारत के ‘मान बाजार’ उनके ही नाम पर हैं। उन्हीं के लिए कहा गया कि ‘सांगानेर का सांगा बाबा, चांदपोल का हनुमान और आमेर की शिला देवी, लाया राजा मान। इस दौरान डॉ. अभिमन्यु सिंह ने सवाई जयसिंह और शिवाजी महाराज के बीच पुरंदर संधि को एक डिप्लोमैटिक मास्टरस्ट्रोक बताते हुए कहा कि आगरा में औरंगजेब की कैद से शिवाजी को निकालने में राजा जयसिंह और राम सिंह की निर्णायक भूमिका थी और इसके ऐतिहासिक प्रमाण भी उपलब्ध हैं। उनमें यही बताया गया है कि जय सिंह ने ही शिवाजी को औरंगजेब की कैद से छुड़ाया था।
डॉ. अभिमन्यु सिंह ने कहा कि मीणा और कछवाहा वंशों के संबंधों को लेकर पसर चुकी लोकप्रिय कथाओं को चुनौती देते हुए कहा कि वास्तविकता इससे कहीं ज्यादा गहरी और जटिल है। उन्होंने बताया कि कछवाहा शासकों के राजतिलक परंपरागत रूप से मीणा सरदार करते थे। राजा दूल्हा राय के समय दोनों वंशों में कोई वैमनस्य नहीं था, बल्कि राजनीतिक स्थिरता थी। डॉ. अभिमन्यु ने कहा कि कछवाहों और मीणाओं के बीच सत्ता परिवर्तन रातों-रात नहीं हुआ था। आमेर, गैटोर, खो, मछेड़ी, दौसा इन सभी क्षेत्रों में खूनी संघर्षों के साक्ष्य मिलते हैं। ये सत्ता परिवर्तन अनवरत युद्ध का परिणाम था, कोई एक घटना नहीं। संगीत प्रस्तुतियों और वर्कशॉप रही खास
फेस्ट के दूसरे और अंतिम दिन रविवार को जयगढ़ किले के ऐतिहासिक वातावरण में कला, संगीत, संस्कृति और विचारों की प्रभावी श्रृंखला देखने को मिली। पहले दिन की रोचक प्रस्तुतियों के बाद उत्सव के दूसरे दिन ने विरासत-प्रेमियों, शोधार्थियों, कलाकारों और आगंतुकों के बीच उत्साह को और गहरा किया। दिवस की शुरुआत डागर आर्काइव्स म्यूजियम के सहयोग से आयोजित पंडित मोहन श्याम शर्मा की प्रस्तुति से हुई, जिसने सुबह का माहौल आध्यात्मिक और संगीतमय बना दिया। इसके बाद जयपुर दरबार सत्र में चित्रकला और फोटोग्राफी विषय पर चर्चा हुई, जिसमें डॉ. गाइल्स टिलॉटसन ने डॉ. मृणालिनी वेंकटेस्वरन से संवाद किया। चर्चा में जयपुर की राजसी विरासत के कलात्मक दस्तावेजीकरण और अभिलेखीय महत्व पर महत्वपूर्ण दृष्टिकोण प्रस्तुत किए गए। लोकसंगीत और वर्कशॉप्स ने खींचा ध्यान आगंतुकों ने चुग्गे खान की ओर से संचालित खड़ताल कार्यशाला में पारंपरिक वाद्य की बारीकियां सीखीं। साथ ही शहजाद और सकील खान की प्रस्तुतियों ने राजस्थान के लोक संगीत की सुरीली धारा को प्रखर रूप से प्रस्तुत किया। दिनभर आगंतुकों ने लक्ष्मी विलास स्थित शिल्प बाजार में पारंपरिक कलाओं को देखा व खरीदा और विलास मंदिर फूड गली में स्थानीय व्यंजनों का स्वाद लिया। विशेष हेरिटेज वॉक ने प्रतिभागियों को जयगढ़ के स्थापत्य और ऐतिहासिक वैभव से परिचित कराया। ‘ओड टू लेपर्ड्स ऑफ जयगढ़’ इंस्टॉलेशन बना आकर्षण का केंद्र जयगढ़ हेरिटेज फेस्टिवल (जेएचएफ) में स्टूडेंट्स की ओर से एक शानदार आर्ट इंस्टॉलेशन ‘ओड टू लेपर्ड्स ऑफ जयगढ़’ के जरिए जयगढ़ के लेपर्ड्स को ट्रिब्यूट दिया जा रहा है। जयश्री पेरीवाल स्कूल के स्टूडेंट्स की ओर से तैयार यह आर्ट इंस्टॉलेशन एक क्रिएटिव ट्रिब्यूट है, जो उन लेपर्ड्स को सम्मान देने के लिए बनाया गया है, जो कभी जयगढ़ पार्क में आजादी से घूमते थे। रिक्लेम्ड स्क्रैप से तैयार इस यह आर्ट पीस में परित्यक्त वस्तुओं को नया रूप देकर आजादी, दृढ़ता और जयपुर की वन्यजीव संरक्षण के प्रति प्रतिबद्धता का प्रतीकात्मक संदेश दिया गया है। कला के माध्यम से जेपीआईएस के स्टूडेंट्स ने जयगढ़ की वाइल्ड स्पिरिट और उसकी संरक्षण-परंपरा का उत्सव मनाया है।

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