राजस्थान के बिजनेसमैन ने इंदौर में ली मुनिदीक्षा:वैराग्य जीवन में किया प्रवेश; बोले- लग्जरी लाइफ और सांसारिक मोह क्षणिक है

अहिल्या नगरी इंदौर आज एक ऐतिहासिक और आध्यात्मिक क्षण की साक्षी बनी। श्री दिगंबर जैन समाज द्वारा आयोजित भव्य जैनेश्वरी दीक्षा महोत्सव में एक साथ कई दीक्षार्थियों का संयम जीवन में प्रवेश हो गया। आचार्य श्री 108 विनम्र सागरजी महाराज और अन्य मुनिश्री, आचार्यश्री के सान्निध्य में विजयनगर स्थित आईडीए ग्राउंड में यह आयोजन किया गया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में नगरीय प्रशासन एवं आवास मंत्री कैलाश विजयवर्गीय उपस्थित रहे। आयोजन में बांसवाड़ा के बिजनेसमैन अनिल मेहता, ऐलक श्री विनमित सागर जी, नितिन जैन (नीरज जी महाराज) सहित अनेक साधक दीक्षा लेकर मोहमाया से मुक्त संयम मार्ग पर अग्रसर हुए। सात महिला दीक्षार्थी साध्वी श्री आस्था जैन, मनीषा जैन, मीरा जैन, सोनम जैन, नेहा जैन, ज्योति जैन व अंशु जैन भी इस दिन वैराग्य का व्रत धारण किया। दिव्य दीक्षा महोत्सव में दिखा दुर्लभ दृश्य
दीक्षा कार्यक्रम की शुरुआत प्रातः 4 बजे केशलोंच से हुई। दीक्षार्थियों ने हंसते हुए अपने केशों का त्याग किया। यह त्याग राग, द्वेष और मोह के विनाश का प्रतीक माना जाता है। गुरु भक्ति, स्तोत्र पाठ, और पारंपरिक मंगल स्नान की क्रियाएं सम्पन्न की गईं। सुबह 9 बजे से कलश यात्रा एवं शोभायात्रा (विजयनगर क्षेत्र से मंदिर तक) निकाली गई। उसके बाद सुबह 10 बजे से मुख्य दीक्षा कार्यक्रम प्रारंभ हुआ।
इस अवसर पर पूज्य आचार्य श्री विशद सागर जी, आचार्य श्री विभव सागर जी, आचार्य श्री प्रसन्न ऋषि जी, आचार्य श्री विप्रणत सागर जी सहित लगभग 100 से अधिक संतगण अपनी पावन उपस्थिति से आयोजन को गरिमामय बनाया। 58 साल के सांसारिक जीवन को त्यागा
इंदौर के डेली कॉलेज में पढ़े बांसवाड़ा के कारोबारी अनिल मेहता अपने 58 साल के सांसारिक जीवन को त्यागकर परम पूज्य आचार्य श्री 108 विनम्र सागरजी महाराज से मुनि दीक्षा ली। डेली कॉलेज इंदौर से पासआउट और क्रिश्चियन कॉलेज से हायर एजुकेशन कर चुके अनिल मेहता का पूरा परिवार उच्च शिक्षित है। उनके इस फैसले पर उनकी पत्नी सहित पूरे परिवार ने सहर्ष सहमति दी। ‘असली जीवन संयम, साधना और तप में है’
दीक्षा महोत्सव में इंदौर सहित प्रदेश के विभिन्न शहरों के अलावा राजस्थान सहित विभिन्न प्रांतों से लोग शामिल हुए। मुनि दीक्षा लेने वाले और वैराग्य जीवन की ओर अग्रसर होने से पहले अनिल मेहता से ‘दैनिक भास्कर’ ने बात की और कहा- लग्जरी जीवन और सांसारिक मोह क्षणिक है, इसमें आनंद नहीं है। जीवन में कुछेक वाकिए ऐसे देखे कि जिन्हें देखकर लगा कि असली जीवन संयम, साधना और तप में है। आपने यह फैसला अचानक कैसे लिया?
पहले तो मैं अपने बारे में बता दूं। हमारा परिवार मूलत: खानपुरा, बांसवाड़ा का है। मेरा पूरा बचपन इंदौर में बीता। यहां पूरी स्कूली शिक्षा सबसे बड़े डेली कॉलेज इंदौर में ली। फिर बीकॉम भी इंदौर के ही क्रिश्चियन कॉलेज से किया। 20 साल की उम्र में ग्रेजुएशन करने के बाद अपने घर बांसवाड़ा लौट गए। वहां मार्बल का बिजनेस शुरू किया। 58 वर्ष की उम्र में वैराग्य ग्रहण करने का कारण?
परिवार में माता-पिता ने संस्कार अच्छे दिए, लेकिन मंदिर जाने के संस्कार बचपन में नहीं मिल पाए क्योंकि शिक्षा के कारण उनसे दूर रहे। इस कारण जैन संस्कार से वंचित रह गए। 25 वर्ष की उम्र में शादी हुई। पत्नी मीनल संस्कारवान मिली और उनके संस्कार से मंदिर जाना शुरू किया। कितना बड़ा परिवार है आपका?
हम चार भाई और दो बहनें हैं। माता-पिता अभी जीवित हैं। एक बेटा और बेटी है, उनकी शादी हो चुकी है। बेटा कृतज्ञ बांसवाड़ा में एडवोकेट है। उसका बिल्डिंग मटेरियल का बिजनेस भी है। बहू पूनम सीए है। बेटी जलज कंपनी सेक्रेटरी और दामाद पल्लव सीए हैं। एक पोता रितिश और नाती जैनी हैं। इन सभी को छोड़कर वैराग्य जीवन का मार्ग चुना है। वैराग्य ज्यादा उम्र में ग्रहण किया जाता है?
वैराग्य जीवन ग्रहण करने की कोई उम्र नहीं होती। वैराग्य तो बचपन और बुढ़ापे में भी हो सकता है। 2024 में जब गुरु खानपुरा में मिले तो गुरुदेव का जो वात्सल्य था, उनकी सरलता मुझे खींच लाई। कहते हैं न एक गुरु होना चाहिए। मुझे पहले शिक्षा तो मिली, लेकिन ज्ञान की शिक्षा नहीं मिल पाई। फिर जब उनसे धर्म को समझा तो एक ही बात सोची कि गुरु के सानिध्य में ही रहना चाहिए। गुरुजी का लगाव मुझे इतना अच्छा लगा कि बार-बार जाना हुआ। उनकी विनम्रता इतनी अच्छी लगी कि घर काटने को दौड़ता था। घर काटने को दौड़ता था, इसका मतलब?
अच्छा नहीं लगता था। ऐसा लगा कि गुरु का सानिध्य ही अच्छा है। उनका सानिध्य मिला तो और भी अच्छा लगा। ऐसा लगता था कि सबकुछ छोड़कर गुरुजी के पास ही रहे क्योंकि मुझे जीवन का कल्याण करना है। यह हमें जो मनुष्य जीवन मिला है यह बहुत ही दुर्लभ है। मुझे लगा कि इस दुर्लभता वाले जीवन में कुछ करना चाहिए। बिना गुरु के यह संभव नहीं है इसलिए वैराग्य मार्ग चुनना अच्छा लगा। आपके फैसले पर परिवार की क्या राय थी?
मैं बहुत खुश किस्मत व्यक्ति हूं, मुझे परिवार ने कभी नहीं रोका। चाहे वह धर्म पत्नी हो, बेटा हो या बेटी किसी ने नहीं रोका। मुझे सपने में गुरुदेव का चेहरा नजर आता था तो सुबह उठते से कहता था कि मुझे गुरु देव ने बुलाया है। परिवार ने तो इतना मोटिवेट किया कि आप गुरु देव के पास जाइए, अपना कल्याण कीजिए। व्यवसाय की बात की तो इतना कहा कि आपका निर्णय हमारे लिए सर्वोपरि है। मैं वाकई में बहुत खुश किस्मत हूं कि परिवार में सभी की सहमति मिली। वैराग्य जीवन के बाद परिवार से तालमेल कैसा रहेगा?
यह वैराग्य मार्ग तो मोह माया से अलग है। यहां मोह माया का कोई काम नहीं। अभी तक पूरी जिंदगी परिवार के लिए दी है। अब मुझे भी अपना वास्तविक जीवन जीना है। यह तो (परिवार) छोड़ना ही पड़ेगा। यह एक तरह से अपने जीवन का बलिदान है। आगे जैसा भी गुरु देव का मार्गदर्शन रहेगा, मैं चलूंगा और जीवन का कल्याण करूंगा। जो भी भौतिक सुख है वह क्षणिक है। मुझे भी कोई कमी नहीं थी। मैं उनसे कहना चाहता हूं कि अपने संस्कारों को, अपने माता-पिता को सम्मान देकर धर्म के मार्ग पर बढ़े। वैराग्य के पहले रात को निकली बिनौली यात्रा
मेहता के वैराग्य ग्रहण करने के पहले शनिवार रात को जैन मंदिर स्कीम 54 से बिनौली यात्रा निकाली गई। जैन समाज में बिनौली यात्रा उस व्यक्ति के सम्मान में निकाली जाने वाली एक भव्य शोभायात्रा है जो सांसारिक जीवन छोड़कर जैन मुनि या आर्यिका बनने की दीक्षा लेने वाला होता है। यात्रा में दीक्षार्थी को बग्घी पर बैठाया जाता है और समुदाय के लोग पारंपरिक वेशभूषा में गाजे-बाजे और जयकारों के साथ शहर के रास्तों से होते हुए यात्रा करते हैं। यह दीक्षा लेने से पहले एक महत्वपूर्ण रस्म है जो दीक्षार्थी के पवित्र मार्ग की शुरुआत का प्रतीक है। इसमें चार बग्घियां, विटेंज कार सहित कई गाड़ियां और डीजे शामिल थे। इसमें बग्घी में मेहता के साथ पत्नी मीनल, परिवार और कुछ नजदीकी लोग थे। इसके अलावा काफी संख्या में समाज के लोग शामिल हुए और यात्रा विजय नगर स्थित कार्यक्रम स्थल पर पहुंचे। इसके बाद कार्यक्रम शुरू हुआ। रविवार तड़के मेहता की केश लोंचन विधान के साथ वैराग्य कार्यक्रम की रस्म शुरू हुई, जबकि मुख्य कार्यक्रम दोपहर में होगा। 100 से अधिक संतगण, जनसैलाब उमड़ा
इस अवसर पर देशभर से हजारों श्रद्धालुओं के इंदौर पहुंचे। विजयनगर क्षेत्र में श्रद्धा, भक्ति और दिव्यता का अद्वितीय संगम देखने को मिला। ऐतिहासिक आयोजन में शोभायात्रा, धर्मसभा, प्रवचन, गुरुभक्ति, और अंत में वात्सल्य भोज भी किया गया।

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