आज गंगनहर 100 साल पुरानी हो चुकी है। यही नहर छप्पनिया अकाल के समय लाखों लोगों के लिए पानी का माध्यम बनी। इंदिरा गांधी नहर का कॉन्सेप्ट भी इसी नहर से आया था। आज इंदिरा गांधी नहर से 2 करोड़ लोगों को पानी मिल रहा है। यह नहर 144 किमी दूर फिरोजपुर से आई थी। इसके लिए 100 साल पहले महाराजा गंगा सिंह ने साढ़े 5 करोड़ खर्च किए थे। छप्पनिया अकाल के समय जब किसान और आम लोगों की मौत होने लगी तो राजा ने ये सोचा कि पंजाब की सतलुज नदी का पानी लाना होगा। दैनिक भास्कर में पढ़िए 100 साल की गंगनहर की कहानी… महाराजा गंगा सिंह की पड़पौत्री व अर्जुन अवॉर्ड विजेता राज्यश्री कुमारी बताती हैं- महाराजा गंगा सिंह महज 2 साल में कैनाल बनाकर बीकानेर तक पानी लेकर आए। इसी कारण गंगा नगर आज इतना समृद्ध हो सका है। इस क्षेत्र में किसानी का तरीका ही बदल गया। पूर्व राज परिवार ने बीकानेर के लिए हमेशा काम किया है। हम आज भी इस परम्परा को निभा रहे हैं। गंगनहर के कॉन्सेप्ट पर बनी इंदिरा गांधी नहर राज्यश्री कुमारी बताती हैं- ये वो वक्त था जब महाराजा गंगा सिंह के हाथ में बीकानेर की कमान थी। बीकानेर भी वो जिसकी सीमा एक तरफ पंजाब से मिलती थी, तो दूसरी तरफ हरियाणा से। वक्त ऐसा आया कि अकाल पड़ने से हर तरफ किसान की मौत हो रही थी। छप्पनिया अकाल आज की सदी के कोरोना काल जैसा था। हर तरफ से सिर्फ मौत के समाचार आ रहा थे। महाराजा परेशान थे कि वो अपनी जनता को आखिर कैसे बचाएं। तब उन्हें ख्याल आया कि सतलुज का पानी बीकानेर में लाया जा सकता है। इसके लिए एक कैनाल बनानी पड़ेगी। लाख कोशिश के बाद आखिरकार गंगा सिंह ने आज ही के दिन 5 दिसम्बर 1925 को बीकानेर कैनाल की नींव पंजाब के फिरोजपुर में रखी। इसी नहर की तर्ज पर बाद में राजस्थान कैनाल बनी, जो आज इंदिरा गांधी नहर के रूप में विख्यात है। जब महाराज ने अंग्रेजों को मनाया राज्यश्री कुमारी बताती हैं- साल 1915 के बाद से ही महाराजा की नजर सतलुज नदी पर पड़ चुकी थी। उनका मन था कि ये पानी बीकानेर लाया जाए तो खेती शुरू हो सकती है। पंजाब राज्य, बहावलपुर राज्य और बीकानेर राज्य तीनों मिलकर ही सतलुज का पानी बीकानेर लाया जा सकता था। पंजाब राज्य पानी देने के लिए समझौता करने को तैयार हो गया लेकिन बहावलपुर राज्य तब भी तैयार नहीं हुए। तब महाराजा गंगा सिंह ने हर तरफ से “लॉबिंग” करके बहावलपुर को तैयार करने का प्रयास किया। इसके बाद भी बहावलपुर के राजा तैयार नहीं हुए। ये प्रोजेक्ट ठंडे बस्ते में चला गया। इसके बाद विश्व युद्ध हुआ तो अंग्रेजों ने दुनियाभर में युद्ध किए। बीकानेर के महाराजा गंगा सिंह ने तब अपना राजनीतिक कौशल दिखाया और अंग्रेजों को बीकानेर कैनाल के लिए तैयार कर लिया। गंगा सिंह की कार्यशैली से अंग्रेज शासन प्रसन्न हुआ। गंगा सिंह ने उनके सामने बीकानेर कैनाल का प्रोजेक्ट रखा और इसे स्वीकृति मिल गई। अगला सपना भाखड़ा का पानी था राज्यश्री कुमारी बताती हैं- बीकानेर के महाराजा गंगा सिंह ने बीकानेर कैनाल बनने के बाद भाखड़ा के पानी को बीकानेर लाने का सपना भी देखा। उन्होंने कई बार भाखड़ा का पानी राजस्थान तक लाने का प्रस्ताव तैयार किया। साल 1943 में मृत्यु तक वो भाखड़ा के पानी को बीकानेर लाने का प्रयास करते रहे। कहा जाता है कि अंतिम समय में बीमार होने के बावजूद वो भाखड़ा प्रोजेक्ट की फाइल ही मांगते रहते थे। गंगानगर, करणपुर, रायसिंहनगर, पदमपुर सहित कई सौ किलोमीटर क्षेत्रफल हरा भरा हो गया। आज भी गंग नगर के लिए अलग से पानी दिया जाता है। फिरोजपुर फीडर से ये पानी श्रीगंगानगर से जुड़े इस हिस्से को मिलता है। नहर में पानी कम होने के बाद भी गंग नहर को पूरा पानी देने का प्रयास हमेशा रहता है। गंग नहर के कारण ही फिरोजपुर भारत में इंदिरा गांधी नहर के मुख्य अभियंता विवेक गोयल बताते हैं कि आजादी से पहले गंग नहर को फिरोजपुर से पानी दिया जा रहा था। यहां बना हुसैनीवाला फीडर इसे संचालित करता था। जब देश का बंटवारा हुआ तो हुसैनीवाला फीडर पाकिस्तान का हिस्सा बन रहा था। अगर ऐसा होता तो फिर गंग नहर को पाकिस्तान से कैसे संचालित किया जाता। तत्कालीन महाराजा सार्दुल सिंह ने इसका विरोध किया। उन्होंने अपने प्रयास करके दोनों देशों के बीच खींची जा रही रेखा को ही बदलवा दिया। ऐसे में कहा जाता है कि फिरोजपुर इसीलिए भारत का हिस्सा है कि उसमें हुसैनीवाला फीडर गंग नहर को पानी देता है। इसी नहर से IGNP का कॉन्सेप्ट गोयल बताते हैं कि आज जिस इंदिरा गांधी नहर के कारण दो करोड़ लोगों को पीने का पानी मिल रहा है, लाखों किसानों को करोड़ों बीघा जमीन को सिंचित करने का पानी मिल रहा है, वो कांसेप्ट भी गंग कैनाल से ही निकला है। आज इंदिरा गांधी नहर 16 जिलों में छह लाख 37 हजार हेक्टेयर जमीन को पानी दे रही है। 65 लाख बीघा जमीन को सिंचित किया जा रहा है। इसी नहर से 14 जिलों को पीने का पानी मिल रहा है। अमर पाल सिंह वर्मा बताते हैं कि आज हम पश्चिमी राजस्थान की जो तस्वीर देखते हैं, वो सौ साल पहले नहीं थी। पीने के लिए भी पानी नहीं था। आज सारा क्षेत्र हरा भरा हुआ है तो उसका श्रेय गंग कैनाल को जाता है।


