राजस्थान मेडिकल सर्विस कॉरपोरेशन लि. (आरएमएससीएल) में अधिकारियों ने खुद की ‘कमाई’ के लिए हेराफेरी कर 168 करोड़ का टेंडर 343 करोड़ रुपए में दे दिया। यहां तक कि इस टेंडर के लिए ना तो बजट था और ना ही इतने अधिक की लागत। इसके बावजूद अधिकारियों ने मिलीभगत का खेल करते हुए टेंडर दे दिया और अब जब मामला सरकार तक पहुंचा तो जांच कमेटी गठित की गई है। ऐसा पहली बार नहीं है कि आरएमएसीएल में टेंडर के नाम पर अधिकारियों ने अपनी जेब नहीं भरी हों। यह प्रदेशभर के अस्पतालों में लगे उपकरणों की मेंटेनेंस से जुड़ा मामला है। इनकी मेंटेनेंस के लिए पहले 168 करोड़ रुपए का भुगतान करना था। इस राशि के अनुसार आरएमएससीएल कंपनी को 4% के हिसाब से भुगतान करता, लेकिन कंपनी और अधिकारियों ने मिलीभगत की 6% तक कर लिया और टेंडर की कीमत 343 करोड़ रुपए कर दी। इसकी सरकार से भी अनुमति ली जानी चाहिए थी, लेकिन आरएमएससीएल एमडी ने इसे एप्रुव कर दिया। चौंकाने वाली बात यह है कि कंपनियां ना तो अस्पतालों की मशीनरी को तुरंत सही करती हैं और इसकी शिकायतें भी आ चुकी हैं। इसके बावजूद आरएमएससीएल ने टेंडर की कीमत दोगुना कर दी। यदि एक्सपर्ट की मानें तो हकीकत में इस टेंडर की कीमत 100 करोड़ तक ही आती है। कहीं से अनुमति नहीं, फिर भी कर दिया स्वीकृत: टेंडर राशि बढ़ाने के लिए हैल्थ विभाग से लेकर वित्त विभाग तक से चर्चा नहीं की गई और टेंडर कर काम शुरू करा दिया। अब चिकित्सा मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर ने जांच के लिए कमेटी बनाई है। प्रिंसिपल सेक्रेटरी हैल्थ गायत्री राठौड़ की अध्यक्षता में बनाई गई कमेटी में अतिरिक्त मिशन निदेशक, निदेशक वित्त, निदेशक आरसीएच को लिया गया है। कमेटी ने नेहा गिरी व चिकित्सा शिक्षा के निदेशक को पत्र लिखकर टेंडर की पूरी जानकारी मांगी है। सवाल: क्या महज चार साल में आरजीएचएस के 90% लाभार्थी बीमार होने लगे वर्ष 2021-2022 में जहां आरजीएचएस लाभार्थियों पर महज 686.48 करोड़ रुपए खर्च हुए वहीं वर्ष 2024-2025 में 4430.62 करोड़ रुपए खर्च कर दिए गए। यानी कि महज चार साल में आरजीएचएस का बजट 3744.14 करोड़ रुपए बढ़ गया। सवाल यह है कि क्या चार साल में आरजीएचएस के 80 फीसदी लाभार्थी बीमार होने लग गए। आरजीएचएस के लाभार्थी भले ही कुछ हजार बढ़े हों, पर 2 साल में दवाई का खर्च बढ़कर 200 करोड़ हुआ दो सालों में गड़बड़ी की पराकाष्ठा हो गई और आईपीडी की तुलना में फार्मेसी बजट 702 करोड़ रुपए बढ़ गया। आईपीडी और डे केयर का कुल खर्च 1863.99 था जबकि फार्मेसी बजट 2566.64 था। इस भुगतान से अंदाजा लगा सकते हैं कि किस स्तर की गड़बड़ी हुई है। 2022 से शुरू हुई गड़बड़ी 2024 तक बढ़ती गई। हालात यह हो गए कि आईपीडी और डे केयर पर जहां 1386.21 करोड़ खर्च किए, वहीं फार्मेसी पर 229.75 करोड़ की अधिक दवा आरजीएचएस में लोगों को खिला दी गई। यानी फार्मेसी का बजट 3 गुना तक हो गया। इसी साल से गड़बड़ी शुरू हुई। यानी इन दो साल में आईपीडी और डे-केयर पर जहां 1315.25 करोड़ रुपए खर्च हुए, वहीं इन दो सालों में फार्मेसी की बिलिंग 1398.54 तक पहुंच गई। आरजीएचएस में इन दो सालों में 83.29 करोड़ अधिक की दवा लोग खा गए। दो साल में आईपीडी और फार्मेसी बजट में बहुत अधिक फर्क नहीं था। आईपीडी और डे-केयर में जहां 340.04 करोड़ खर्च किए, वहीं फार्मेसी पर 298.89 करोड़ ही खर्च हुआ, हालांकि इन वर्षों में आरजीएचएस को कुछ समय बाद शामिल किया गया था। राजस्थान गवर्नमेंट हेल्थ स्कीम (आरजीएचएस) में हर दिन गड़बड़ी बढ़ती जा रही है और करोड़ों रुपए का भ्रष्टाचार हो रहा है। अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जहां आरएमएससीएल 7 करोड़ लोगों के लिए सभी तरह की दवाई पर हर साल 1100 करोड़ रुपए खर्च करता है वहीं आरजीएचएस में महज 60 लाख लाभार्थियों पर 2000 करोड़ रुपए से अधिक केवल दवाई के खर्च कर रहा है। चौंकाने वाली बात यह है कि आरजीएचएस के लाभार्थी भले ही महज कुछ हजार बढ़े हों लेकिन पिछले दो सालों में ही दवाई पर होने वाला खर्च 200 करोड़ से अधिक हो गया है। दैनिक भास्कर की पड़ताल में सामने आया है कि आईपीडी की तुलना में फार्मेसी की बिलिंग काफी अधिक बढ़ी है और इसके पीछे डॉक्टर्स और मेडिकल स्टोर संचालकों की मिलीभगत है।


