राजस्थान हाईकोर्ट का आदेश:मंत्रालयिक कर्मियों के तबादलों पर कोर्ट ने लगाई रोक, नए सिरे से करने के आदेश

राजस्थान हाईकोर्ट जस्टिस अरूण मोंगा की बैंच ने पंचायत राज विभाग द्वारा प्रदेश भर में किए गए एक हजार से अधिक मंत्रालयिक कर्मचारियों के तबादला आदेश पर रोक लगाते हुए नए सिरे से आदेश करने के निर्देश दिए है। याचिकाकर्ता रामचन्द्र व अन्य की ओर से याचिकाए पेश की गई थी जिसमें अधिवक्ता जेएस भलेरिया सहित कई अधिवक्ताओं ने पैरवी की। हाईकोर्ट ने केरा राम बनाम राजस्थान राज्य और अन्य के मामले में दिए गए फैसले को दृष्टिगत रखते हुए आदेश पारित किया। हाईकोर्ट ने कहा कि जहाँ निर्वाचित पंचायत निकायों को कानून के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करने का अवसर नहीं दिया गया था। यह राज्य अधिकारियों की अपनी प्रशासनिक श्रेष्ठता को न छोड़ने की जिद को दर्शाता है। पंचायती राज अधिकारियों के तबादले के संबंध में जारी दिशा-निर्देशों और निंदा को बहुत हल्के में लिया गया। केरा राम में दिए गए फैसले के बावजूद, जिसमें पंचायती राज अधिकारियों के लिए तबादले के दिशा-निर्देश भी जारी किए गए थे, एक ऐसा आदेश था जो राज्य के अधिकारियों के तबादले के लिए उचित नहीं था। राज्य द्वारा प्रशासनिक शक्ति का प्रयोग करके तथा निर्वाचित पंचायत निकायों के लोकतांत्रिक क्षेत्र में अतिक्रमण करके 1000 से अधिक पंचायत अधिकारियों का बड़े पैमाने पर तबादला अभियान चलाया गया। संपति के उपयोग की आवश्यकता मकान मालिक के दृष्टिकोण से तय की जानी चाहिए हाईकोर्ट जस्टिस विनीत कुमार माथुर की बैंच ने कहा कि किराए की संपति के वास्तविक उपयोग की आवश्यकता को मकान मालिक के दृष्टिकोण से आंका जाना चाहिए, न कि किरायेदार के दृष्टिकोण से। हाईकोर्ट ने किराया अपीलीय अधिकरण उदयपुर के आदेश को उचित मानते हुए हस्तक्षेप से इंकार कर याचिका को खारिज कर दिया हाईकोर्ट कहा कि यह सुझाव देना या दर्शाना किरायेदार के अधिकार क्षेत्र में नहीं है कि मकान मालिक को किराए के परिसर की आवश्यकता नहीं है। याचिकाकर्ता ने किराया अपीलीय अधिकरण के आदेश को चुनौती दी थी जिसमें प्रतिवादी-मकान मालिक द्वारा प्रस्तुत अपील को स्वीकार किया गया है। कोर्ट ने कहा कि यह मकान मालिक को तय करना है कि संपत्ति के परिसर का उपयोग कैसे और कब किया जाना चाहिए। खाद्य अपमिश्रण निवारण अधिनियम के तहत हो रही कार्यवाही रद्द, याचिकाकर्ता आरोप मुक्त हाईकोर्ट जस्टिस फरजंद अली की बैंच ने खाद्य अपमिश्रण निवारण अधिनियम के तहत ट्रायल कोर्ट द्वारा अपराध के लिए संज्ञान लेने की पूरी कार्यवाही को रद्द करते हुए याचिकाकर्ता को आरोप मुक्त कर दिया। हाईकोर्ट ने आदेश में कहा कि यहां तक कि अपराध का संज्ञान पीएफ अधिनियम के तहत न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा लिया गया था, जिन्होंने यह देखने की जहमत नहीं उठाई कि जिस क़ानून के तहत वह आदेश पारित कर रहे थे, वह लागू भी था या नहीं। हाईकोर्ट ने खाद्य अपमिश्रण निवारण अधिनियम, 1954 के तहत 2011 में शुरू की गई कार्यवाही को रद्द कर दिया।

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