झारखंड में हर साल एचआईवी एड्स के औसत 1500 से 1700 नए संक्रमितों की पहचान हो रही है। झारखंड स्टेट एड्स कंट्रोल सोसाइटी के आंकड़ों को देखें तो पिछले चार सालों में 6 हजार से ज्यादा एड्स के नए संक्रमित मिल चुके हैं। 2020-21 में 1380, 2021-22 में 1452, 2022-23 में 1890 और 2023-24 में करीब 1500 मामले सामने आ चुके हैं। वर्तमान में राज्य में करीब 17000 एचआईवी एड्स से पीड़ित हैं। जांच की बात करें तो हर साल करीब सवा छह लाख लोगों की जांच की जाती है। अगर एचआईवी एड्स को लेकर फिलहाल राज्य में 10 से ज्यादा संस्थाएं लोगों के बीच जागरूकता फैलाने का काम रही है। जबकि, दर्जनों एड्स पीड़ित भी संस्थाओं के साथ जुड़कर दूसरों को बीमारी के प्रति जागरूक रहे हैं। झारखंड में कई संस्थाएं एचआईवी एड्स के प्रति जागरूकता फैलाने का काम रही है सेक्स वर्कर्स को दिव्यम ड्रीम फाउंडेशन भी कर रही जागरूक दिव्यम ड्रीम फाउंडेशन झारखंड में एड्स के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए निरंतर प्रयास कर रही है। फाउंडेशन की इन्स्ट्रक्टर प्रतिमा ने बताया कि संस्था न केवल एड्स पीड़ितों के लिए काम करती है, बल्कि सेक्स वर्कर्स को भी इस बीमारी के बारे में जागरूक करती है। यह फाउंडेशन सेक्स वर्कर्स के बीच सुरक्षित यौन व्यवहार, नियमित परीक्षण और एचआईवी संक्रमण से बचाव के उपायों पर विशेष ध्यान देती है। फाउंडेशन की पहल से इस समुदाय को न केवल स्वास्थ्य संबंधी जानकारी मिल रही है, बल्कि उन्हें सामाजिक और मानसिक समर्थन भी प्राप्त हो रहा है। नेटवर्क फॉर पीपल लिविंग विद एचआईवी एड्स सोसाइटी का किया गठन एड्स पीड़ित ने दूसरे एड्स पीडितों को जागरूक करने को लेकर नेटवर्क फॉर पीपल लिविंग विद एचआईवी एड्स सोसाइटी का गठन किया है। अब नेशनल एड्स कंट्रोल सोसाइटी का प्रोजेक्ट लेकर भी जागरूकता के लिए काम कर रहे हैं। अब तक 25 हजार से ज्यादा लोगों को जागरूक कर चुके हैं। गांव-गांव जाकर नुक्कड़ नाटक, कॉलेजों में सेमिनार, लेक्चरर आदि देकर जागरूकता फैला रहे हैं। यहीं नहीं, 252 संक्रमितों की पहचान भी करा चुके हैं। हजारीबाग के रहने वाले एड्स पीड़ित ने काफी चुनौतियों का सामना किया। इन्होंने न सिर्फ खुद को संभाला, बल्कि अपनी खुद की एनजीओ बनाकर सरकार के साथ मिलकर संक्रमितों को जागरूक कर रहे हैं। भास्कर से बातचीत में उन्होंने कहा- मुझे साल 2000 में एड्स के बारे में पता चल गया था, लेकिन मैं संक्रमण को नजरअंदाज कर रहा था। फिर कुछ साल के बाद इसके लक्षण बढ़ने लगे और शरीर पूरा डैमेज होने लगा। जनवरी 2006 में टेस्ट कराया तो रिपोर्ट फिर पॉजिटिव मिली। दो साल मैं गांव आकर ओझा-गुणी के चक्कर में फंसा रहा। तब मुझे रास्ता दिखाने वाला कोई नहीं था। बीमारी के बारे में 1000 में से 1 व्यक्ति को भी ठीक से जानकारी नहीं थी। हिम्मत टूट गई थी। मन में बस मरने का ख्याल आ रहा था। फिर रस्सी लेकर कई बार मैं जंगल की ओर भी आत्महत्या के लिए निकल पड़ा। मां पीछे दौड़ते हुए समझाकर वापस लाई। कुछ डॉक्टरों ने कहा था कि 3 महीने ही जिंदा रहूंगी। लेकिन, डायट का सही से पालन करने की सलाह व दवाएं दी। आज 20 साल बाद भी जिंदा हूं और मेरा बेटा भी 26 साल का हो गया है। जब मैं संक्रमित हुआ, रास्ता दिखाने वाला कोई नहीं था कई एड्स संक्रमित अपनी संस्था बनाकर भी लोगों को कर रहे जागरूक


