राज्य के सबसे बड़े चिकित्सा संस्थान रिम्स में किडनी ट्रांसप्लांट सेवा शुरू होने की दिशा में बड़ी उपलब्धि हासिल हुई है। रिम्स को किडनी ट्रांसप्लांट के लिए सक्षम प्राधिकारी से स्वीकृति प्राप्त हो चुकी है। हालांकि औपचारिक लाइसेंस अभी जारी होना बाकी है। इस संबंध में रिम्स निदेशक डॉ. राजकुमार की अध्यक्षता में बुधवार को हुई उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक में किडनी ट्रांसप्लांट यूनिट की तैयारियों की समीक्षा की गई। बैठक में चिकित्सा अधीक्षक डॉ. हीरेंद्र बिरुआ, माइक्रोबायोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. मनोज कुमार, यूरोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. अरशद जमाल, पैथोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. अंशु जमवार, सेंट्रल लैब इंचार्ज डॉ. अनूपा प्रसाद, सर्जरी विभाग के डॉ. अजय कुमार और सोटो झारखंड के नोडल पदाधिकारी डॉ. राजीव रंजन सहित कई वरिष्ठ चिकित्सक मौजूद थे। बैठक में स्पष्ट किया गया कि किडनी ट्रांसप्लांट सेवा की शुरुआत पूरी तरह सुरक्षित और मानक के अनुरूप हो, इसके लिए प्रारंभिक कुछ ट्रांसप्लांट देश के अनुभवी बाहरी विशेषज्ञ डॉक्टरों की देखरेख में किए जाएंगे। इसकी जिम्मेदारी डॉ. अजय कुमार को सौंपी गई है। प्रबंधन का मानना है कि इससे रिम्स के डॉक्टरों को भी उच्च स्तरीय ट्रेनिंग मिलेगी। जांच की जिम्मेदारी माइक्रोबायोलॉजी विभाग को: किडनी ट्रांसप्लांट से संबंधित सभी जांचों की गुणवत्ता और निगरानी की जिम्मेदारी माइक्रोबायोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. मनोज कुमार को सौंपी गई है। डेडिकेटेड डायलिसिस यूनिट भी होगी बैठक में निर्णय लिया गया कि रिम्स में डेडिकेटेड किडनी ट्रांसप्लांट यूनिट विकसित की जाएगी। इसमें अत्याधुनिक ऑपरेशन थिएटर, विशेष आईसीयू सुविधा, डेडिकेटेड डायलिसिस यूनिट की व्यवस्था होगी, ताकि एक ही स्थान पर संपूर्ण इलाज मिले। ट्रांसप्लांट के लिए विशेषज्ञ डॉक्टरों, प्रशिक्षित नर्सों और स्टाफ की अलग टीम गठित की जाएगी। उपकरण खरीद प्रक्रिया तेज, टेंडर जारी रिम्स प्रबंधन ने बताया कि ट्रांसप्लांट से जुड़े कई आवश्यक उपकरणों की निविदा प्रक्रिया पहले से जारी है। शेष उपकरणों की खरीद भी जल्द पूरी की जाएगी। इसके अलावा, ट्रांसप्लांट से जुड़ी सभी आवश्यक जांचों, दवाओं और इम्यूनोसप्रेसेंट दवाओं की सूची तैयार कर समयबद्ध खरीद सुनिश्चित करने का निर्णय लिया गया है। इलाज में 10 से 20 लाख रुपए तक की होगी बचत झारखंड के मरीजों को फिलहाल किडनी ट्रांसप्लांट के लिए दिल्ली, चेन्नई, वेल्लोर, कोलकाता या निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ता है। वहां इलाज पर 10 से 20 लाख रुपए तक खर्च आता हैै। रिम्स में यह सुविधा शुरू होने के बाद गरीब और मध्यम वर्गीय मरीजों को अपने राज्य में ही इलाज मिलेगा। बाहर इलाज कराने का बोझ और यात्रा खर्च बचेगा। सरकारी दरों पर ट्रांसप्लांट होने से लाखों रुपये की सीधी बचत होगी। डायलिसिस पर वर्षों से निर्भर मरीजों को नई जिंदगी का मौका मिलेगा।


