रीमा हूजा- वन्यजीव संरक्षण की शुरूआत स्वयं से हो:बोलीं-जंगलों में पहले जो पारम्परिक स्थितियां थीं वे वन्यजीवों के प्रति अच्छी थीं

इतिहासविद, लेखक, स्मारक संरक्षणकर्ता प्रोफेसर रीमा हूजा आज उदयपुर यात्रा पर रही। इस दौरान उन्होंने मेवाड़ के जंगल से जुड़े प्रंजेंटेशन को देखने के बाद अपनी बात रखी। वे यहां मंगलवार को भूपाल नोबल्स विश्वविद्यालय के सभा शिरोमणि सभागार में ‘दक्षिणी राजस्थान में वन एवं वन्यजीव प्रबन्धन का इतिहास: मेवाड़ रियासत के संदर्भ में (1818 से आधुनिक काल तक का इतिहास अध्ययन)’ पर शोध पत्र पठन कार्यक्रम में शामिल हुई। शोधार्थी उमा भाटी के शोध का प्रंजेंटेंशन देखने के बाद हूजा ने बताया कि इस शोध से साफ हो जाता है कि पारम्परिक जो स्थितियां थी वह वन, प्रकृति और वन्यजीवों के प्रति अच्छी थी। वन है और उसमें रहने वाले उसका उपयोग करता है। उन्होंने कहा कि हम पेड़ बचाने या वन्यजीवों के संरक्षण की बात तो करते है लेकिन हम उसे अपने से लागू करेंगे तो कुछ बात बनेगी। उन्होंने सुझाव दिया कि इस विषय पर जयपुर में भी प्रदर्शनी लगाकर परिचर्चा आयोजित करनी चाहिए ताकि वन और वन्यजीवों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी सब तक साझा की जानी चाहिए। कार्यक्रम में भूपाल नोबल्स के डीन पीजी स्टडीज डा. पी एस रावलोत, डीन फैकल्टी ऑफ़ साइंस डा. माधुरी राठौड़ इतिहास विभाग प्रमुख डा. पंकज आमेटा, इतिहासकार डा. जेके ओझा, डा. राजेंद्र नाथ पुरोहित, डा. विवेक भटनागर ने भी अपनी बात रखी। सुपरवाईजर इतिहास विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ भानु कपिल ने कहा कि इस विषय पर यह पहला शोध है जिसमे वन और वन्यजीव के इतिहास की जानकारी तीनों काल, राजा महाराजा के समय, ​ब्रिटिश कालीन समय और आजादी के बाद का समय का अध्ययन एक साथ किया गया है। वन विभाग के भी अधिकारी इसमें शामिल हुए। इसमें डीएफओ मुकेश सैनी, ग्रीन पीपल सोसाइटी अध्यक्ष रिटायर्ड आईएफएस राहुल भटनागर, सेवानिवृत वन अधिकारी वीएस राणा, प्रताप सिंह चुंडावत, डा. सतीश शर्मा, डा. रघुवीर सिंह शेखावत, डा. बशोभी भटनागर, जंगजीत सिंह बनेड़िया, जितेंद्र सिंह चुंडावत, विक्रम सिंह राठौड़, दातार सिंह शेखावत, नागेंद्र सिंह शक्तवात, गौरव सिंघवी, देवेंद्र सिंह शेखावत, रिए टोयोडा, सरोज कंवर, फादर स्टीफन मौजूद थे।

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