रीवा में दशहरे के अवसर पर आज गद्दी पूजन कर सैकड़ों वर्ष पुरानी परम्परा का निर्वहन किया गया। जिसमें सैकड़ों लोग और राजघराने के लोग शामिल हुए। जहां भगवान रामलला की विशेष पूजा अर्चना की गई। दरअसल रीवा राजघराने के लिए यह परंपरा बेहद ही खास है। जिसमें महराजा पुष्पराज सिंह के साथ युवराज दिव्यराज सिंह भी शामिल हुए। अब जानिए इस परम्परा के बारे में
रीवा में गद्दी पूजन दशहरे के अवसर पर रीवा किले में होने वाली एक पारंपरिक पूजा है, जिसमें भगवान राम को ‘राजाधिराज’ के रूप में गद्दी पर विराजमान किया जाता है, और बघेल वंश के रीवा के महाराज उनकी पूजा-अर्चना करते हैं। यह परंपरा 350 वर्षों से अधिक समय से चली आ रही है, जिसके तहत महाराज स्वयं गद्दी पर नहीं बैठते बल्कि भगवान राम के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करते हैं। पूजा के बाद एक प्रतीकात्मक चल समारोह निकाला जाता है। रीवा किले के अंदर होता है आयोजन
यह आयोजन रीवा किले के अंदर किया जाता है। इस दिन राजसिंहासन पर राजाधिराज भगवान राम को विराजमान माना जाता है और उनकी पूजा की जाती है। बघेल वंश के रीवा के महाराजा,शाही पोशाक पहनकर और हाथ में तलवार लेकर,भगवान राम की पूजा-अर्चना करते हैं। रीवा के महाराज स्वयं गद्दी पर नहीं बैठते, बल्कि वे रामराजा के प्रतिनिधि के रूप में राज्य चलाते थे। यह बघेल राजवंश की एक शाही परंपरा है जिसकी जड़ें बांधवगढ़ से रीवा में राजधानी स्थानांतरित होने के बाद से जुड़ी हैं। यह रीवा के लोगों के लिए दशहरे के उत्सव का एक मुख्य आकर्षण होता है। गद्दी पूजन के बाद महाराज प्रजा जनों को संबोधित करते हैं और फिर नीलकंठ छोड़ते हैं,जिसके बाद शहर में एक अनूठा चल समारोह निकाला जाता है।


