लखनऊ के SGPGI में किडनी फेल बच्चों पर रिसर्च:स्टेरॉयड देने से फायदा नहीं होने पर जीन म्यूटेशन कराने से मिलेगी मदद

बच्चों में होने वाले किडनी फेलियर के ज्यादातर मामलों के पीछे नेफ्रोटिक सिंड्रोम बेहद अहम कारण है। इस खतरनाक बीमारी में 10 से 30% बच्चे इलाज के दौरान स्टेरॉयड देने पर भी रिस्पॉन्ड नहीं करते हैं। स्टेरॉयड असिस्टेंट, नेफ्रोटिक सिंड्रोम से पीड़ित मरीजों के लिए आमतौर पर कई बार सेकेंड लाइन इम्यूनो सप्रेसेंट से भी इलाज किया जाता है जो गंभीर मरीज के लिए बेहद टॉक्सिक साबित होता है। इसके कई साइड इफेक्ट भी होते हैं। ये कहना है SGPGI के नेफ्रोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ.नारायण प्रसाद का। उन्होंने बताया कि संस्थान में 560 बच्चों पर हुए रिसर्च में ये सामने आया है। ऐसे 64 बच्चे थे, जिनको स्टेरॉयड असिस्टेंट नेफ्रोटिक सिंड्रोम के कारण इलाज में राहत नहीं मिल रही थी। इन मरीजों के लिए जेनेटिक म्यूटेशन कराकर टॉक्सिक या साइड इफेक्ट वाले ट्रीटमेंट से बचाया जा सकता है। इस रिसर्च को दुनिया के टॉप मेडिकल जर्नल में शुमार ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी की क्लीनिकल किडनी जर्नल में पब्लिश किया गया है। कैंपस@लखनऊ सीरीज के 69वें ऐपिसोड में SGPGI के नेफ्रोलॉजी विभाग के प्रमुख प्रो.नारायण प्रसाद से खास बातचीत… प्रो. नारायण प्रसाद कहते है कि बच्चों में किडनी फेलियर के ज्यादातर मामले कॉनजीनाइटल यानी जन्म से होते है। CAKUT यानी Congenital Anamolities of Kidney and Urinary Tract से जुड़ी समस्याएं इसी कैटेगरी में आती हैं।

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