लखनऊ हाईकोर्ट- बिना विधिक प्रक्रिया खाता फ्रीज करना गलत:बैंक को सिविल और आपराधिक परिणामों का सामना करना होगा

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि बैंक बिना उचित कानूनी प्रक्रिया का पालन किए किसी व्यक्ति या संस्था के खाते को फ्रीज नहीं कर सकते। ऐसा करने पर बैंकों को सिविल और आपराधिक परिणामों का सामना करना पड़ेगा। यह निर्णय न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने खालसा मेडिकल स्टोर द्वारा दायर याचिका पर दिया। याचिकाकर्ता ने बताया कि उसका एक्सिस बैंक खाता हैदराबाद की राचकोंडा पुलिस द्वारा बीएनएसएस की धारा 94 और 106 के तहत जारी नोटिस के बाद फ्रीज कर दिया गया था। नोटिस में कहा गया था कि एक साइबर अपराध के पीड़ित के खाते से धोखाधड़ी करके पैसे इस खाते में ट्रांसफर किए गए थे। सुनवाई के दौरान, बैंक के वकील ने स्वीकार किया कि उन्हें नवंबर 2025 में डेबिट फ्रीज का नोटिस मिला था, लेकिन अभी तक कोई औपचारिक जब्ती आदेश या फ्रीज की जाने वाली विशिष्ट राशि के बारे में जानकारी नहीं दी गई है। न्यायालय ने टिप्पणी की कि बैंक को जारी नोटिस में किसी राशि का उल्लेख नहीं था। इसके अतिरिक्त, बैंक द्वारा बार-बार अनुरोध करने के बावजूद विवेचक ने न तो एफआईआर की प्रति उपलब्ध कराई और न ही कोई विधिवत जब्ती आदेश प्रदान किया। ऐसी स्थिति में याचिकाकर्ता के खाते को फ्रीज नहीं रखा जा सकता। न्यायालय ने संबंधित खाते को तत्काल डी-फ्रीज करने का आदेश दिया। न्यायालय ने दिशा-निर्देश जारी करते हुए कहा कि विवेचक द्वारा बैंक खाता फ्रीज किए जाने से संबंधित सूचना तत्काल बैंक या भुगतान सेवा प्रणाली के नोडल अधिकारी को भेजी जानी चाहिए। साथ ही, जैसे ही किसी बैंक को खाता ब्लॉक करने की सूचना भेजी जाती है, उसी समय यह सूचना 24 घंटे के भीतर संबंधित क्षेत्राधिकार के न्यायिक मजिस्ट्रेट को भी भेजी जानी चाहिए।

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