लाहौरियां मंदिर का माघ माह का मेला शुरू आज अदा की जाएगी कढ़ाई चढ़ाने की रस्म

हेमंत | जालंधर शहर के मिट्ठा बाजार स्थित प्राचीन मंदिर लाहौरिया में माघ मास में लगने वाले ऐतिहासिक बाबा लालू यशराय पाकिस्तान वालों का मेला शुरू हो चुका है। 14 फरवरी तक चलने वाले इस मेले में पूरे देश से ही नहीं, विदेशों से भी लोग आते हैं, लेकिन रविवार के दिन की यहां रौनक अलग ही होती है। माघ माह का पहला रविवार आज यानी 18 जनवरी को है। यहां खन्ना, मल्होत्रा, सेठ और कपूर बिरादरी के लोग अपने कुल देवता बाबा जी के मंदिर में चोटी चढ़ाने और मुंडन करवाने के लिए आते हैं। मंदिर में “चोटी’ एक महत्वपूर्ण धार्मिक रस्म है जो बाबा लालू यशराय जी के वार्षिक मेले के अवसर पर होती है। इसमें श्रद्धालु मन्नत पूरी होने पर मंदिर में चोटी (शिखा) चढ़ाते हैं। यह रस्म आमतौर पर जनवरी-फरवरी में होती है और मेले की शुरुआत का प्रतीक है, जिसे कई चरणों में पूरा किया जाता है। मंदिर की प्रबंधक कमेटी के चेयरमैन अश्वनी कुमार सेठ, प्रधान इंद्रमोहन खन्ना, कैशियर नरेश मल्होत्रा, सेक्रेटरी अशोक सेठ, राजेश खन्ना, अमित कपूर, नीतिन कपूर, करन खन्ना ने बताया कि मंदिर में शनिवार को सूर्यास्त के बाद चोटी संस्कार, रविवार का कढ़ाई चढ़ाई जाएगी। इसके तहत चोटियों की रस्म 24, 31 जनवरी और 7 और 14 फरवरी को होगी, जबकि कढ़ाई चढ़ाने की रस्म 18, 25 जनवरी और 1 और 15 फरवरी को होगी। साल 1947 में बंटवारा हुआ और लाहौर पाकिस्तान के हिस्से चला गया। जालंधर की फिजा में प्राचीन परंपराएं आज भी महकती हैं। हमारा प्राचीन मंदिर लाहौरिया मिट्ठा बाजार लाहौर के नाम की निशानी है। माघ माह में हर साल यहां मेला लगता है। जालंधर व पंजाब के बाकी शहरों से भक्त आते हैं लेकिन रविवार को रौनक सर्वाधिक होती है। इस वार्षिक मेले का सबसे मुख्य और महत्वपूर्ण आकर्षण “चोटी’ (शिखा) चढ़ाने की धार्मिक रस्म है। यह रस्म न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह श्रद्धालुओं की मन्नतों और उनके विश्वास से गहराई के साथ जुड़ी हुई है। मान्यता है कि जिन भक्तों की मन्नतें बाबा के दरबार में पूरी होती हैं, वे अपनी कृतज्ञता प्रकट करने के लिए मंदिर में चोटी अर्पित करते हैं। ऐसी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह रस्म मेले के विधिवत शुभारंभ का प्रतीक मानी जाती है। चोटी चढ़ाने की इस प्रक्रिया को अत्यंत शुद्धता और विधि-विधान के साथ कई चरणों में पूरा किया जाता है। देश-विदेश से श्रद्धालु विशेष रूप से इस रस्म में भाग लेने के लिए शहर पहुंचते हैं।

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