उदयपुर के जंगलों में आग की घटनाएं मार्च से ही शुरू हो गई। इस बीच, वन विभाग की ओर से अब निकाला गया एक आदेश सवालों के घेरे में आ गया है। विभाग ने जंगल को आग से बचाने के लिए बनाई गई फायर लाइनों तथा अन्य संसाधनों की जांच करने को कहा है और 30 अप्रैल तक रिपोर्ट देने को कहा है। इस आदेश पर सवाल इसलिए उठ रहे हैं, क्योंकि जंगल तो मार्च माह से ही जलना शुरू हो गए। बढ़ती गर्मी के बीच ऐसी घटनाएं बढ़ती हैं। इससे पहले ही फायर लाइनों की जांच कराई जानी थी। अब तक सज्जनगढ़, अंबेरी, चित्रकूट नगर, अमरखजी, देबारी सहित कई पहाड़ियां धधक चुकी हैं। सैकड़ों हेक्टेयर जंगल खाक हो चुका। राख में कई जगह फायर लाइन का नामोनिशान भी मिट चुका है। उदयपुर में होली के बाद से ही जंगल में आग की घटनाएं शुरू हो जाती हैं। इस बार होली 13-14 मार्च को थी। इससे पहले ही 4 मार्च को सज्जनगढ़ की पहाड़ियां धधक उठी थीं। भारतीय वन सर्वेक्षण की 2021 की रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश के जंगलों में आगजनी की 3 हजार घटनाएं होती हैं। इनमें से एक हजार घटनाएं अकेले उदयपुर में होती हैं। अलग-अलग रेंज के हिसाब से फायर लाइन की लंबाई अलग-अलग होती है। 6 सहायक वन संरक्षकों को जिम्मा, 6 जिलों का जंगल खंगाला जाएगा वन संरक्षक (सीएफ) सुनील चिद्री ने 9 अप्रैल को आदेश निकाला है। इसमें 6 सहायक वन संरक्षक (एसीएफ) को पूरे संभाग की फायर लाइनों की जांच करने की जिम्मेदारी सौंपी है। संभाग में चित्तौड़, राजसमंद, उदयपुर, डूंगरपुर, प्रतापगढ़ व बांसवाड़ा का जंगल शामिल है। आदेश के तहत संभाग के सभी वन मंडलों में वर्ष 2024-25 में बनी फायर लाइनों का शत प्रतिशत मूल्याकंन कर रिपोर्ट देनी होगी। इसके अलावा आग बुझाने के लिए मौजूद संसाधनों भी बताने होंगे। इसके बाद मई माह में सीसीएफ कार्यालय में तैनात उप वन संरक्षकों से इन सभी फायर लाइनों में से 10 फीसदी को क्रॉस चेक कराया जाएगा। प्रदेश में सबसे ज्यादा उदयपुर में धधकती हैं पहाड़ियां, एक हजार तक घटनाएं सेवानिवृत्त सीसीएफ राहुल भटनागर के अनुसार फायर लाइन दीपावली के बाद नवंबर और दिसंबर में बननी चाहिए। इन फायर लाइनों की जनवरी-फरवरी में जांच की जानी चाहिए और इनके बीच फिर से उगी वनस्पति को साफ कराना चाहिए। पतझड़ से पत्तियां जमा होने से आग फैलने का डर रहता है। अब आग के कारण कुछ जगह तो फायर लाइन का नामोनिशान मिट गया होगा। फायर लाइन मतलब… जंगल में करीब 10 मीटर चौड़ाई में घास-झाड़ी व अन्य वनस्पति हटाकर बंजरनुमा किया जाता है। यह लाइन कई मीटर लंबाई तक बनाई जाती है। ताकि आग लगे तो जंगल के एक हिस्से से दूसरे हिस्से की ओर क्रॉस न हो और बुझ जाए। यह तरीका बहुत ही कारगार रहता है।


