वागड़ के किसान का नवाचार:फसल के बीच गेंदा और मक्का लगाकर मिर्च-टमाटर को निमेटोड रोग से बचाया

सोशल मीडिया और सोशल साइट्स सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं बल्कि आत्मनिर्भरता और आर्थिक मजबूती का जरिया भी बन सकती हैं। इसी का उदाहरण पेश किया है कुशलगढ़ के घाटा गांव के आदिवासी किसान राजेश कुमार डिंडोर ने। राजेश पेशे से शिक्षक हैं लेकिन कम पानी में खेती कर और उत्पादन बढ़ाकर अब खेती-किसानी के क्षेत्र में नजीर बन चुके हैं।किसान राजेश ने बताया, पिता के दिव्यांग हाेने के कारण बचपन बहुत कठिनाइयों में बीता। खरीफ में खेती कर जैसे-तैसे गुजारा करते थे। वर्ष 2012-13 में मैंने खुद पहल कर सब्जियों की खेती शुरू की। लेकिन पानी नहीं हाेने के कारण खेती छोड़ देनी पड़ी। लेकिन हारा नहीं। सोशल मीडिया, विशेषज्ञों और जानकार किसानों से बात की। खेत को तैयार करने से लेकर फसल को बेचने तक हर दृष्टि से पानी बचाने, अधिकतम उपज लेने और उचित दाम ​हासिल करने की योजना तैयार की। पानी बचाने के लिए बूंद-बूंद सिंचाई का सिस्टम लगवाया। मिनी कल्टीवेटर, स्प्रे पंप जैसी मशीनों का उपयोग शुरू किया। अपने 4 बीघा खेत में ड्रिप एरिगेशन के साथ ही मल्चिंग की व्यवस्था की। इससे कम पानी में फसल को जरूरत का पानी मिल जाता है। इसकी सहायता से पूरे साल सब्जी की खेती कर पाते हैं। उत्पादन अच्छा और गुणवत्ता बेहतर मिलती है। राजेश ने बताया, मिर्च और टमाटर की फसल को निमेटोड रोग काफी नुकसान पहुंचाता है। इसमें सूक्ष्म सूत्रकृमि जड़ों पर हमला करते हैं, जिससे जड़ों में गांठे बन जाती हैं, पत्तियां पीली पड़ जाती हैं और पौधे का विकास रुक जाता है। इस पर नियंत्रण के लिए इन फसलों के बीच-बीच में गेंदा लगाया। गर्मी के समय गेंदे के साथ बीच-बीच में मक्का की बुवाई की। इससे मिर्च-टमाटर में रोग नहीं लगता। अब सालभर में मैं टमाटर, मिर्च, वालोर (सेम), बैंगन, तरोई, लौकी, कद्दू आदि 10 प्रकार की सब्जियों और गेंदे के फूलों की खेती करता हूं। आमदनी सालाना 3-4 लाख रुपए बढ़ गई है। प्लानिंग, निगरानी और नवाचार का ही नतीजा है कि पूरी सब्जियों की खपत स्थानीय कुशलगढ़ बाजार में ही हाे जाती है। फसल काे बाहर भेजने की जरूरत नहीं पड़ती।

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