8 बार मुझ पर जानलेवा हमले हुए। 24 मुकदमे दर्ज हुए। कपड़े उतारकर, हाथ पीछे बांधकर अपराधी की तरह बाजारों में घुमाया। इस सदमे से मेरे बड़े भाई की मौत हो गई। मेरा गुनाह सिर्फ इतना था कि मैं अरावली बचाने के लिए लड़ रहा हूं। कारगिल की लड़ाई लड़ी। दुश्मन की गोली खाई। राष्ट्रपति से वीर चक्र मिला, लेकिन जब अपने गांव की अरावली को बचाने निकला तो सरकार ही दुश्मन बन गई। तीन साल जान हथेली पर रखकर अरावली बचाने के लिए संघर्ष किया। नीमकाथाना (सीकर) के कैलाश मीणा 30 साल से अरावली के लिए संघर्ष कर रहे हैं तो डाबला के जयराम सिंह नायक पद से वीआरएस लेकर अरावली बचाने में जुटे हैं। भास्कर की स्पेशल सीरीज ‘अरावली हमारी लाइफ लाइन’ में आज पढ़िए इन हीरोज की कहानी… सामाजिक कार्यकर्ता और पर्यावरण संरक्षक नीमकाथाना के कैलाश मीणा 30 साल से क्षेत्र में बजरी और खनन माफिया के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। कहते हैं- मैं कोई अकादमिक एक्टिविस्ट नहीं हूं। हम तो अपना अस्तित्व बचाने के लिए यह मुहिम चला रहे हैं। शुरू में हमें लगा कि प्रशासन और सरकारों को चिठ्ठी पत्री लिखने, शिकायत देने से सुनवाई होगी, लेकिन जल्द ही हमें हकीकत का आभास हो गया। इसके बाद हमने जन संवाद कार्यक्रमों और पंचायत सभाओं के माध्यम से लोगों को जागरूक करना शुरू किया। खनन माफिया ने स्थानीय अधिकारियों और राजनेताओं के गठजोड़ से इतना मजबूत तंत्र बना लिया है कि उसे तोड़ पाना मुश्किल हो गया है। लड़ाई की शुरुआत कहां से हुई पूछने पर कैलाश मीणा कहते हैं- शुरुआत में कुछ किसान और ग्रामीण अवैध खनन का मुद्दा लेकर मेरे पास आए। यहीं से हमारी लड़ाई शुरू हुई। संघर्ष को 30 साल हो गए, लेकिन आज भी इसका अंत नजर नहीं आ रहा। मुझ पर खनन माफिया 8 बार जानलेवा हमला करा चुके हैं। पहला हमला 2011 में जयपुर से नीमकाथाना लौटते समय हुआ। गुंडों ने सड़क के किनारे मेरी गाड़ी रुकते ही लाठी और रॉड से मुझ पर हमला कर दिया। शोर मचाने पर खेतों में कर रहे लोगों ने मेरी जान बचाई। एक बार डम्पर से कुचलने का भी प्रयास किया गया। मेरी बाइक को भी टक्कर मारी। मुझ पर आखिरी हमला 2017 में हुआ था। परिवार मेरी सुरक्षा को लेकर इतना आशंकित रहता है कि सूरज ढलने से पहले मुझे घर पहुंचना पड़ता है। बेटा, दोस्त और ग्रामीण साथी दिन में कई बार काॅल पर लोकेशन पूछते हैं। सुरक्षा पुख्ता करते हैं और बताते हैं कि लोग तुम्हारा पीछा कर रहे हैं। मैं पहले पैदल ही चलता था, बसों में सफर करता था। हमलों के बाद मेरी सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए मुझे कुछ दोस्तों ने चंदा इकठ्ठा कर एक गाड़ी दिलवाई। गाड़ी की किश्त, मेंटीनेंस और पेट्रोल का खर्चा भी वो लोग ही बीते 19 साल से उठा रहे हैं। 24 झूठे मुकद्दमे लगे, कपड़े परेड निकाली, सदमे से बड़े भाई की मौत इतने लंबे संघर्ष में कभी हिम्मत भी टूटी? इस सवाल पर कैलाश की आंखों में आंसू आ गए। रुंधे गले से बोले- साल 2011 मेरे लिए इतनी चुनौतियां लेकर आया कि मैं हिम्मत हारने लगा। डाबला जान आंदोलन में मुझे पकड़कर पांव में गोली मारने तक की साजिश थी। उसी साल झूठे मुकद्दमें में मुझे गिरफ्तार कर जेल में बंद कर दिया गया। बाद में मेरे कपडे़ उतारकर, अर्धनग्न हालत में पाटन की मुख्य सड़क पर हाथ पीछे बांधकर किसी अपराधी की तरह परेड कराई गई। मकसद साफ था, डर पैदा करना, ताकि कोई अरावली के लिए खड़ा न हो। 30 दिसंबर, 2011 को मेरी जमानत हो गई, लेकिन इस घटना से मेरे बड़े भाई मुरारीलालजी को इतना गहरा धक्का पहुंचा की 15 दिन बाद ही उनकी मौत हो गई। वो मेरे लिए पिता समान थे। उनकी मौत से मैं इतना टूट गया कि सबकुछ बेचकर हमेशा के लिए सीकर बसने का फैसला कर लिया। बाद में पत्नी और बेटे की हिम्मत से मैंने यहीं रहकर अपना संघर्ष जारी रखने का फैसला किया। 24 झूठे मुकद्दमों में से 21 में मुझे कोर्ट से बरी कर दिया गया है। चार महीने पहले मेरी पत्नी भी चल बसी। उसकी अस्थियां मैंने अरावली से निकलने वाली गिरजन नदी में प्रवाहित की हैं। अब भी इसी उम्मीद में संघर्ष कर रहा हूं कि एक दिन इन चुनौतियों के स्थाई हल मिलेंगे। मैं अपनी पीढ़ी की रक्षा के लिए लड़ रहा हूं। अगर हम आज चुप रहे तो कल हमारे बच्चे कहां जाएंगे? जयराम सिंह : छुट्टियों में गांव आए, माइन ब्लास्टिंग के विरोध में उतरे नीमकाथाना से हम 25 किमी दूर डाबला गांव पहुंचे। यहां नोपाला की ढाणी में मुलाकात हुई जयराम सिंह से। जयराम सिंह ने राज राइफल्स से नायक पद से वीआरएस लिया था। बताते हैं, 2011 में मैं छुट्टियों में घर आया हुआ था। गांव के स्कूल के ग्राउंड में हम वॉलीबाॅल खेल रहे थे। इसी दौरान 8-10 महिलाएं आईं और बताया कि गांव की सीमा में मौजूद पहाड़ी में दिन-रात खनन होता है। ब्लास्टिंग से छिटक कर आने वाले पत्थरों से उनकी भेड़ बकरियां, गाय भैंस और बच्चे बुज़ुर्ग तक घायल हो जाते हैं। कुछ घरों में तो बकरियों की मौत भी हो चुकी है। जयराम बताते हैं कि शुरू में तो हमने ध्यान नहीं दिया, लेकिन जब एक महिला की कमर की हड्डी पत्थर लगने से टूट गई तब लगा कि समस्या गंभीर है। 1 मई, 2011 को हम लोगों ने घेराव कर माइनिंग साइट से जाने वाले डम्परों का रास्ता रोका। महिलाएं भी हमारे साथ थी। पता चला कि क्रेशर प्लांट के मालिक ने शॉर्टकट के लिए गांव के 1200 बीघा चारागाह से रास्ता बनाया हुआ था। वहां से गुजरने वाले डम्परों से उड़ने वाली धूल से पूरे गांव में बारीक डस्ट का गुबार छा जाता था। यह भी पता चला कि एनजीटी (नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल) भोपाल की रिपोर्ट में उस समय इलाके में 174 क्रेशर प्लांट सक्रिय थे, जबकि परमिशन सिर्फ 42 के पास थी। कई दिन धरना देने के बाद 4 मई को भारी पुलिस दल, कमांडो, रास्ता खाली करवाने आए। हमने उन्हें कहा कि नियमानुसार चरागाह और आबादी क्षेत्र में माइनिंग नहीं हो सकती। उन्होंने बात नहीं मानी। ग्रामीण और पुलिस आमने सामने हो गए। 6 महिलाओं और 6 पुरुषों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। कई ग्रामीण और पुलिसकर्मी घायल हुए। मुझे पकड़ने की कोशिश की गई, लेकिन मैं 50-60 युवा साथियों के साथ पहाड़ी पर बने दुर्गा माता मंदिर पर ही धरना देने लगा। उस समय मैं ऑन ड्यूटी सेना का जवान था। प्रशासन ने मेरी कंपनी में कॉल कर भी काफी दबाव डलवाया। जब हम पीछे नहीं हटे तो क्रेशर प्लांट का काम रोक दिया गया। बाद में जांच में गांव की सीमा के 500 से 800 मीटर के दायरे में तीन क्रेशर प्लांट चालू मिले, जिन्हें बंद कर दिया गया। 4 महीने बाद ही माइनिंग फिर से शुरू हो गई और मुझे वापस छुट्टी लेकर आना पड़ा। मामले की गंभीरता को देखते हुए मैंने सर्विस से रिटायरमेंट के 16 साल पहले ही वीआरएस (31 अगस्त, 2012) लेने का फैसला किया। कारगिल में चोटियों की रक्षा की, यहां प्रशासन ही खिलाफ हो गया जयराम बताते हैं कि मैं 1999 में कारगिल की लडाई में शामिल था। द्रास सेक्टर में मेरी कंपनी ने 3 पिम्पल (KNOLL HILL) को दुश्मनों के कब्जे से छुड़ाया। ऑपरेशन के दौरान मेरे दाएं पांव में गोली लगी थी। हमारे 24 जवान शहीद हुए। हमने हार नहीं मानी। उस वक्त के राष्ट्रपति केआर नारायणन ने मुझे वीर चक्र से सम्मानित किया। जब मेरे अपने गांव की पहाड़ की रक्षा करने की बारी आई तो मेरे खिलाफ खनन माफिया ही नहीं पूरा प्रशासन खड़ा था। भारत जोड़ो यात्रा के दौरान अलवर में इस पूरे मामले को लेकर हम राहुल गांधी से मिले। तत्कालीन कांग्रेस सरकार को राहुल गांधी के कहने के बाद हमारी मांगें माननी पड़ी। सीमा से अधिक खनन के चलते पहाड़ को 20 की जगह 80 फीट तक खोद दिया था। झूठे मुकद्दमे लगाए गए। हमारे साथियों को गिरफ्तार किया गया। झड़प हुई, लाठीचार्ज हुआ लेकिन हम पीछे नहीं हटे। प्लांट बंद करवाने के लिए धरने पर बैठे रहे। हमारी तीन मांगें थी- पहली झूठे मुकद्दमे वापस हों। दूसरी प्लांट चरागाह और गांव की सीमा से दूर लगे। तीसरी हमारे पक्ष में आए सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के आदेशों की अक्षरशः पालना हो। दरअसल क्रेशर प्लांट मालिकों ने अन्य गांव से एनओसी लेकर प्लांट हमारी सीमा में लगाया था। 13 सितम्बर 2012 को हाई कोर्ट ने हमारे पक्ष में फैसला देते हुए जमीन का कन्वर्जन रद्द कर दिया और एनओसी भी कैंसिल कर दी। …. अरावली हमारी लाइफ लाइन सीरीज से जुड़ी ये खबरें भी पढ़िए… 1. पीली हो जाएगी गुलाबी नगरी, बिना झीलों का उदयपुर:दिनभर धूल के तूफान, बिना मास्क सांस नहीं, AI से देखिए अरावली खत्म होने के खतरे एक नई परिभाषा के अनुसार 100 मीटर से ऊंची पहाड़ी को ही अरावली माना जाएगा। ये पहाड़ियों को काटने वालों के लिए एक वैध हथियार’ बन जाएगी। पूरी खबर पढ़िए… 2. अरावली न हो तो पाकिस्तान में बरसेगा राजस्थान का मानसून:1.50 लाख से ज्यादा पहाड़ियों पर खनन का खतरा, अब तक 25% चोटियां खत्म, पार्ट-2 सुप्रीम कोर्ट ने आदेश में कहा है कि फिलहाल नए खनन की अनुमति नहीं है। लेकिन सच ये है कि अवैध खनन धड़ल्ले से हो रहा है। राजस्थान में अब तक करीब 25% अरावली की पहाड़ियां नष्ट हो चुकी हैं। पूरी खबर पढ़िए…


