स्वतंत्रता दिवस और विभाजन-विभीषिका स्मृति दिवस के अवसर पर तुलसी साहित्य समिति द्वारा केशरवानी भवन में काव्यगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम ने देशभक्ति, एकता, सामाजिक समरसता और विभाजन की पीड़ा को समाहित करते हुए उपस्थित सभागार में गूंजता स्वर प्रदान किया। इस आयोजन की अध्यक्षता वरिष्ठ अधिवक्ता ब्रह्माशंकर सिंह ने की, वहीं मुख्य अतिथि की भूमिका में गीता मर्मज्ञ पं. रामनारायण शर्मा उपस्थित थे। सदस्यों और अतिथियों ने रामचरितमानस और एसपी. जायसवाल द्वारा रचित ‘सरगुजिहा रामायण’ के संक्षिप्त पाठ के साथ कार्यक्रम की शुरुआत की। अध्यक्षीय उद्बोधन में ब्रह्माशंकर सिंह ने इतिहास में स्वतंत्रता और विभाजन के द्वंद्व को याद करते हुए कहा कि राजनीतिक भूलों ने कुछ हिस्सों को भारत से अलग कर दिया, जो अब केवल राष्ट्रगान की पंक्तियों में जीवित हैं। उन्होंने अमीरी-गरीबी और विकास की असमानता को दूर करने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया और कहा, अनगिनत बलिदानों के बाद स्वतंत्रता का सूर्य उदित हुआ, लेकिन आज भी देश के कई हिस्से विकास की रोशनी से वंचित हैं। मुख्य अतिथि पं. रामनारायण शर्मा ने नैतिक मूल्यों के पतन पर चिंता व्यक्त करते हुए अनुशासन और मर्यादा के पालन की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा, हमारा गौरवशाली इतिहास और परंपरा हमें सकारात्मक दृष्टिकोण और दृढ़ संकल्प अपनाने की प्रेरणा देते हैं। सामाजिक समरसता की बात करते हुए उन्होंने उन्माद फैलाने वालों के खिलाफ ठोस कदम उठाने का आह्वान किया। विशिष्ट अतिथि सच्चिदानंद पांडेय ने कहा कि जनता और सत्ता के बीच से ‘एजेंट’ की श्रंखला हटाकर सत्ता पर नैतिक दबाव बनाना ही वास्तविक सुधार का मार्ग है। उन्होंने विशेष रूप से युवाशक्ति को राष्ट्रनिर्माण में अपनी सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करने का आह्वान किया। कवि रामलाल विश्वकर्मा ने दिल से अगवानी देते हुए मजहबी भेदों को भूलकर देश की एकता बनाए रखने की बात कही। वरिष्ठ कवि जय गुप्त ने स्वतंत्रता के जश्न के साथ विभाजन की पीड़ा को भी याद रखने और उससे सीख लेने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया। कार्यक्रम में आचार्य दिग्विजय सिंह तोमर, कवि राजेन्द्र राज, चन्द्रभूषण मिश्र, देवेन्द्रनाथ दूबे, विनोद तिवारी, प्रकाश कश्यप, जयंत खानवलकर और अजय सागर ने श्रद्धा और भावभीनी कविताओं से कार्यक्रम को मन्त्रमुग्ध कर दिया।


