राज्य सरकार के करीब 10 लाख कर्मचारियों के विभिन्न कैडर में पदोन्नति के अवसरों में असमानता ने बड़ा विभेद पैदा कर दिया है। कुछ कैडर में जितने मूल पद पर कर्मचारी तैनात हैं, उनमें से न्यूनतम 12 प्रतिशत से 35 फीसदी तक कर्मचारियों का ही प्रमोशन संभव है। जबकि कुछ कैडर की स्थिति यह है कि जितने मूल पदों पर कर्मचारी हैं, उससे ज्यादा उनके लिए पदोन्नति के पद बना दिए गए हैं। पदोन्नति नहीं देने के बावजूद सरकार कर्मचारियों को वेतनमान तो बढ़ाकर दे रही है, लेकिन पद नहीं दे रही। सरकार के सिस्टम का आलम यह है कि ऐसी बड़ी विसंगति पर किसी भी अधिकारी की नजर आज तक नहीं पड़ी। स्थिति यह है कि बहुत से कैडर में आए कर्मचारी जिस पद पर आए, उसी से या उसके अगले पद से ही रिटायर तक हो गए। न पदोन्नति का पद, न चयनित वेतनमान सहायक कर्मचारी संवर्ग को न तो पदोन्नति के पद दिए गए हैं और न ही पदोन्नति पद का चयनित वेतनमान। ऐसे में जिस पद पर ये कर्मचारी नियुक्त हुए हैं, उन्हें प्रशासनिक और वित्तीय दोनों ही रूप से घाटे में हैं। हर दिन ऐसे कर्मचारी सरकार से अपने लिए डिमांड कर रहे हैं। सरकार को कोई वित्तीय घाटा नहीं अखिल राजस्थान राज्य कर्मचारी संयुक्त महासंघ के प्रदेशाध्यक्ष महावीर शर्मा का कहना है कि सरकार चयनित वेतनमान के माध्यम से 9, 18 व 27 वर्ष की सेवा पर पदोन्नति का वेतनमान तो दे रही है, लेकिन पदोन्नति का पद नहीं। जबकि यदि वह पदोन्नति का पद देती है तो सरकार को किसी प्रकार का वित्तीय घाटा नहीं होता। पदोन्नति हो रही 15-20 वर्ष में, नियम 5 वर्ष अनुभव का ग्राम विकास अधिकारी, पटवारी, कृषि पर्यवेक्षक, सूचना सहायक, कांस्टेबल जैसे कैडर ऐसे हैं, जिनमें पहली पदोन्नति के लिए 5 वर्ष के अनुभव होने का नियम है। स्थिति यह है कि इन कैडरों में आज भी 15 से 20 वर्ष के अनुभव होने के बावजूद पदोन्नति नहीं मिल पा रही। कारण, पदोन्नति के पदों की संख्या का नहीं होना। कुछ को मिल रहे 5 से 7 मौके सचिवालय सेवा, हाईकोर्ट, विधानसभा सचिवालय, राजस्थान प्रशासनिक सेवा, एलोपैथी चिकित्सक सहित कुछ कैडर में कर्मचारी-अधिकारियों को पदोन्नतियों के 5 से 7 अवसर मिल रहे हैं। जबकि तृतीय श्रेणी शिक्षक, शारीरिक शिक्षक, एएनएम, पशुधन निरीक्षक, नर्सिंग अधिकारी में नियुक्ति वाले पद से ही रिटायर हो रहे या पदोन्नति के 1-2 अवसर मिल रहे हैं।


