पांच ज्ञानेंद्री, पांच कर्मेंद्री शरीर रूपी रथ के घोड़े हैं। इन घोड़ों को चलाता है मन, जो लगाम है। इसलिए बाहरी विषयों से मन हटाना चाहिए। केवल परमात्मा की प्राप्ति के लिए ही निरुपाधि भाव से जो भजन करता है, वह घोड़े की तरह इधर-उधर दौड़ता रहता है। इसलिए इसे नियंत्रित करना चाहिए। एरोड्रम क्षेत्र में दिलीप नगर नैनोद स्थित शंकराचार्य मठ इंदौर के अधिष्ठाता ब्रह्मचारी डॉ. गिरीशानंदजी महाराज ने अपने नित्य प्रवचन में बुधवार को यह बात कही। …और घोड़े ने पी लिया पानी महाराजश्री ने एक दृष्टांत सुनाया- एक व्यक्ति था वह घोड़े पर बैठकर कहीं जा रहा था। रास्ते में पानी की मोटर चल रही थी। उसने सोचा घोड़े को पानी पिला दूं। वह घोड़ो को ले गया। मोटर की आवाज सुनकर घोड़ा भड़क गया। घोड़े वाले ने मोटर वाले से कहा- मोटर बंद कर दो, आवाज आ रही है। उसने मोटर बंद कर दी तो पानी आना ही बंद हो गया। अब पानी कहां से पिलाएं। घोड़ा वाला पानी वाले से बोलने लगा- मैंने आवाज बंद करने को कहा था, पानी बंद करने को नहीं। किसान ने कहा यदि घोड़े को पानी पिलाना हो तो लगाम कसकर पकड़ो, क्योंकि पानी आएगा तो आवाज तो होगी ही। घोड़े वाले ने वैसा ही किया तो घोड़े ने पानी पी लिया। मन घोड़े की तरह ही है… डॉ. गिरीशानंदजी महाराज ने कहा कि इसी तरह लोग बिल्कुल निरुपाधि भाव से भजन करना चाहते हैं, पर यह चाहत तो उस घोड़े वाले के समान है, मन घोड़े की तरह ही है। उपाधि छोड़ने का उपाय करोगे तो वह उछल-कूद करेगा। इसलिए उपाधियों के ऊपर ध्यान न देकर विषय रूपी घोड़े की मन रूपी लगाम को मजबूती से पकड़ो और बुद्धि लगाकर उसे वश में करके आत्मसाक्षात्कार करो।


