शंकराचार्य मठ इंदौर में प्रवचन:हमेशा स्वाभिमान से रहो अभिमान से नहीं- डॉ. गिरीशानंदजी महाराज

कभी-कभी ज्यादा सोच लेने और अति उत्साह में व्यक्ति यह मानने लगता है, कि मैं जो कर सकता हूं, वह कोई नहीं कर सकता। वह घमंड में इतना चूर हो जाता है, कि वह रावण की तरह भगवान को भी चुनौती देने लगता है। अभिमान किसी का भी नहीं रहता। घमंड चकनाचूर हो जाता है, इसलिए स्वाभिमान से रहो अभिमान से नहीं। स्वाभिमान में मर्यादा होती है, समर्पण होता है, गलत बात से समझौता नहीं होता। जो सही है सो सही है। एरोड्रम क्षेत्र में दिलीप नगर नैनोद स्थित शंकराचार्य मठ इंदौर के अधिष्ठाता ब्रह्मचारी डॉ. गिरीशानंदजी महाराज ने अपने नित्य प्रवचन में शुक्रवार को यह बात कही। सत्य प्रताड़ित हो सकता है पर पराजित नहीं डॉ. गिरीशानंदजी महाराज ने कहा कि अभिमानी असत्य को ही सत्य साबित करने में लगा रहता है। जिसके कारण उसे हानि हो जाती है। वह कहीं का नहीं रहता है, लोक का न परलोक का। इसलिए हमेशा हमें सत्य का ही साथ देना चाहिए। सत्य को स्वीकार करना चाहिए, क्योंकि हर आदमी यह जानता है और कहता भी है कि सत्य प्रताड़ित हो सकता है पर कभी पराजित नहीं होता। सत्य पर जीने वाला ही स्वाभिमानी होता है। उसका इहलोक और परलोक दोनों ही सुधर हुए जाते हैं। ..और डिब्बी में बंद कीड़े को भी मिल गया भोजन महाराजश्री ने एक दृष्टांत सुनाया- एक राजा था, वह सोचने लगा प्रजा का पालक तो मैं हूं। लोग जबरदस्ती ही शास्त्रों-पुराणों, स्मृतियों में भगवान विष्णु को ही पालक क्यों कहते हैं और पूजन करते हैं। मेरा भी पूजन होना चाहिए। राजा के माता-पिता धार्मिक थे और गुरु परंपरा से जुड़े हुए थे। जिसके कारण राजा भी गुरु परंपरा से जुड़ा हुआ था। जब उसके मन में ऐसा विचार आया तो वह समझने के लिए अपने गुरु के पास चला गया। गुरुदेव से बोला- प्रजा-पालन तो मैं करता हूं, फिर लोग विष्णु भगवान को क्यों मानते हैं। गुरुदेव ने कहा राजन बताओ, तुम्हारे राज्य में कितने पशु-पक्षी, कीड़े-मकोड़े हैं? राजा बोला- यह तो मुझे नहीं मालूम। गुरुदेव ने कहा- राजन जब तुम्हें यह ही नहीं मालूम तो फिर तुम पालन क्या करोगे? राजा ने कहा- ठीक है गुरुदेव मैं एक कीड़े को डिब्बी में बंद करता हूं। देखता हूं उसे भोजन कैसे मिलता है। यदि इसे भोजन मिल गया तो मैं आपकी बात मान लूंगा। राजा ने कीड़ा उठाया और डिब्बी में बंद कर दिया। जब दूसरे दिन उसने डिब्बी खोली तो कीड़ा एक चावल खा रहा था। राजा चकित हो गया, क्योंकि वह चावल राजा के सिर में जो टीका में लगा हुआ था, वह डिब्बी बंद करते समय गिर गया था। राजा गुरु के पास गया, चरणों में गिर गया, गुरुदेव आपकी बात सही है। हम सबके पालक भगवान विष्णु ही हैं। आपने मेरा अभिमान तोड़कर बहुत कृपा की। गुरुदेव ने कहा- यह सब तुम्हारे माता-पिता और खानदान का गुरु परंपरा से जुड़े होने का ही फल है। जो गुरुओं से जुड़ा रहता है, गुरु उसे अभिमानी बनने से बचाकर स्वाभिमानी बना देते हैं, जिससे उसकी कीर्ति और विजय पताका हमेशा चहुंओर फैली रहती है।

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