विश्व का महानतम धार्मिक मेला है मां गंगा-यमुना- गुप्त सरस्वती की त्रिवेणी के तट पर चल रहा प्रयागराज का महाकुंभ। वसुधैव कुटुंबकम् की अवधारणा को चरितार्थ करता हुआ भारतीय संस्कृति का यह अद्भुत आयोजन हमारी सभी सांस्कृतिक चेतनाओं में सामूहिक रूप से आता है। एरोड्रम क्षेत्र में दिलीप नगर नैनोद स्थित शंकराचार्य मठ इंदौर के अधिष्ठाता ब्रह्मचारी डॉ. गिरीशानंदजी महाराज ने अपने नित्य प्रवचन में मंगलवार को यह बात कही। समूचे विश्व को अपने अंदर समेट लेने का सामर्थ्य महाराजश्री कहा कि ऐसे आयोजन देश ही नहीं बल्कि समूचे विश्व को अपने अंदर समेट लेने का सामर्थ्य रखते हैं। इसी कारण कुंभ मेले में पग-पग पर विभिन्न संस्कृतियां अपनी पूरी चमक-दमक के साथ देखने को मिलती है। विभिन्न संस्कृतियों के लोग ढोलक, मजीरा, मृदंग की थापों पर थिरकते नजर आते हैं। जिन आयोजनों के द्वारा युवा पीढ़ियों को बहुत कुछ देखने को मिलता है। नदी में स्नान करते हुए सूर्य को अर्ध्य देना इसकी सहजता की अभिव्यक्ति है, जो भक्त को भगवान के स्पर्श का अनुभव कराती है। हमारे देश में ऐसी कोई भी नदी नहीं है, जहां मकर संक्रांति जैसे पर्व पर लोगों का मेला न लगता हो। मेला सभी का ध्यान अपनी ओर करता है आकर्षित डॉ. गिरीशानंदजी महाराज ने कहा कि प्रयागराज में महाकुंभ उसी मेले का विशालतम रूप है। यह मेला विश्व का सबसे बड़ा माना जाने वाला मेला सभी का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करता है। यह मेला बताता है कि मनुष्य जाति सनातन के प्रति कृतज्ञ है और भागवत धर्म में अटूट आस्था रखती है। प्रयागराज समूचे विश्व का एकमात्र ऐसा स्थान है, जहां गंगा, यमुना, सरस्ती ने वेदकाल से भी पहले महायज्ञ किया था। वह यज्ञ स्थल आज भी पवित्र संगम की तरह धार्मिक आस्था से देखा जाता है। जहां लोग पूजन-अर्चन करते हैं। ये तीनों नदियां योगिनी हैं, जीवन दायिनी और मोक्ष दायिनी भी हैं। ज्ञान, भक्ति, कर्म और सत, चित्त, आनंद की त्रिवेणी के रूप में दिखाई देने वाली ये नदियां भारतीय संस्कृति का पूरा इतिहास जानती हैं। सनातन धर्म की साक्षात्कार सबसे पहले इन्हीं नदियों ने किया और ऋषियों को कराया। इसी कारण इन ऋषि स्वरूपा नदियों के पवित्र संगम को भारत का प्राण कहा जाता है।


