शरीर से मोह छोड़ने पर ही आत्मस्वरूप की अनुभूति संभव : तपस्वी मुनि श्री

भास्कर न्यूज | लुधियाना धर्मसभा में बुधवार को तपस्वी मुनि श्री ने शरीर से मोह छोड़कर आत्मा पर ध्यान केंद्रित करने की साधना के महत्व पर विस्तृत प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आत्मा की शुद्धि और जीवन की सच्ची शांति शरीर से मोह त्यागने में है। मुनि श्री ने स्पष्ट किया कि कायोत्सर्ग का अर्थ है – काया से जुड़ी आसक्ति और मेरा-पन को छोड़ देना। जब साधक शरीर को अपना मानना त्याग देता है, तभी आत्मस्वरूप की अनुभूति होती है। मुनि श्री ने कहा कि शरीर की थकान, मन का बोझ और कर्मों का भारीपन केवल आत्मा पर ध्यान केंद्रित करने की साधना से ही हल्का होता है। इस साधना में बैठकर साधक यह भाव करता है कि यह शरीर मेरा नहीं है। इसी भाव से दुख, पीड़ा और बंधन क्षणभर में समाप्त हो जाते हैं। जब साधक शरीर से जुड़ी भूख-प्यास, सुख-दुख, थकान आदि को त्यागकर केवल आत्मा पर ध्यान केंद्रित करता है, तो उसकी आत्मा शुद्ध, पवित्र और शांत हो जाती है। प्रवचन में मुनि श्री ने बताया कि अतीत के बुरे अनुभव और संस्कार मनुष्य को चैन से जीने नहीं देते। शरीर में रहते हुए भी उससे परे उठ जाना ही साधक का लक्ष्य होना चाहिए। सभा में मौजूद माताओं, बहनों और धर्मानुरागियों ने श्रद्धा से प्रवचन सुना। गणपति बप्पा मोरया और जयकारों से वातावरण भक्तिमय हो गया।जब मनुष्य शरीर से ऊपर उठकर आत्मा में स्थित हो जाता है, तभी सच्चे सुख और शांति का अनुभव करता है।

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