एम्स भोपाल में गंभीर चिकित्सकीय लापरवाही का एक मामला सामने आया है। आरोप है कि इमरजेंसी में भर्ती न किए जाने के कारण एक आदिवासी मरीज की जान चली गई। इस संबंध में शिकायतकर्ता हरिओम परते ने एम्स डायरेक्टर को पत्र लिखकर घटनाक्रम की शिकायत दर्ज कराई है, वहीं मानवाधिकार आयोग में भी मामला दर्ज कराया गया है। शिकायत के अनुसार, 30 वर्षीय संजू, पिता गोकुल, निवासी हरदा जो आदिवासी वर्ग से आने वाला एक गरीब व्यक्ति था, को 23 दिसंबर 2025 को हरदा जिला चिकित्सालय से 108 एंबुलेंस के माध्यम से गंभीर हालत में एम्स भोपाल रेफर किया गया था। आरोप है कि एम्स के इमरजेंसी वार्ड पहुंचने के बाद ड्यूटी पर मौजूद डॉक्टरों ने मरीज की हालत को नजरअंदाज करते हुए उसे भर्ती करने से इनकार कर दिया। इतना ही नहीं, जिला अस्पताल से रेफर होकर आए मरीज को बिना अटेंड किए ओपीडी में आने की सलाह दी गई। शिकायतकर्ता का कहना है कि मरीज की हालत अत्यंत गंभीर थी, इसके बावजूद उसे ‘नॉर्मल’ बताकर वापस हरदा भेज दिया गया। इलाज न मिलने के कारण रास्ते में ही संजू की मृत्यु हो गई। हरिओम परते ने इसे चिकित्सा के स्थापित मानकों का उल्लंघन बताते हुए कहा कि यह सीधे तौर पर मरीज के जीवन के अधिकार और मानवाधिकारों का हनन है। शिकायतकर्ता ने मांग की है कि पूरे प्रकरण की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराई जाए तथा दोषी पाए जाने वाले जिम्मेदार डॉक्टरों और अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि भविष्य में ऐसी घटनाएं न हों, इसके लिए अस्पताल में इमरजेंसी प्रोटोकॉल का सख्ती से पालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए। एम्स का दावा- यहां बिना जांच मरीज रेफर नहीं करते एम्स भोपाल में कुछ महीने पहले ही ‘ नो रेफरल पॉलिसी’ लागू की गई है। इसके तहत इमरजेंसी में आने वाले हर मरीज की पहले जांच की जाती है और उसके बाद ही आवश्यकता पड़ने पर दूसरे अस्पताल में रेफर किया जाता है। इसके बावजूद रेफर होकर आए मरीज को बिना अटेंड किए वापस भेजे जाने से एम्स प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो गए हैं। शव वाहन सेवा कहां है सरकार! मजबूरी… ऑटो में मासूम का शव ले गया मजदूर परिवार भोपाल| हमीदिया में 14 महीने की बच्ची की मौत के बाद परिजनों को शव ले जाने के लिए भी संघर्ष करना पड़ा। बैतूल जिले का मजदूर परिवार इलाज के लिए बच्ची को हमीदिया लाया था, जहां इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। इसके बाद अस्पताल परिसर में सक्रिय निजी एम्बुलेंस संचालकों ने बच्ची का पार्थिव शरीर बैतूल ले जाने के लिए 10 हजार रुपए मांगे। परिजनों ने बताया कि वे सिर्फ 6 हजार रुपए ही दे सकते हैं, लेकिन एम्बुलेंस संचालक नहीं माने। मजबूर होकर परिजन ऑटो में बच्ची का शव ले गए। आरोप है कि हमीदिया अस्पताल में निजी एम्बुलेंस का पूरा नेटवर्क सक्रिय है, जो अन्य एम्बुलेंस को परिसर में आने नहीं देता। कुछ समय पहले ही सरकार ने ऐसे लोगों के लिए शव वाहन की सुविधा शुरू की थी। लेकिन, यह सुविधा सिर्फ जिले के अंदर के लिए ही है। दूसरे जिलों के मरीजों को यह सुविधा नहीं मिलती है। भोपाल आरटीओ जितेंद्र शर्मा का कहना है एंबुलेंस संचालक द्वारा मनमानी वसूली के संबंध में मुझे जानकारी मिली है। जांच करवाई जाएगी। एंबुलेंस के फिटनेस और परमिट भी जांचें जाएंगे।


