जिला मुख्यालय पर इन दिनों यातायात व्यवस्था पूरी तरह पटरी से उतर चुकी है। शहर के मुख्य मार्गों से लेकर सरकारी दफ्तरों के बाहर तक नो-पार्किंग जोन में खड़े बेतरतीब वाहनों ने आमजन का पैदल चलना भी दूभर कर दिया है। विडंबना यह है कि यातायात पुलिस की उदासीनता के चलते नियमों की धज्जियां सरेआम उड़ रही हैं, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी मौन साधे बैठे हैं। सरकारी दफ्तरों के बाहर संकट: कलेक्ट्रेट और कोर्ट आने वाले परिवादी होते हैं परेशान सबसे विकट स्थिति जिला कलेक्ट्रेट, न्यायालय परिसर और अन्य महत्वपूर्ण सरकारी कार्यालयों के बाहर देखने को मिल रही है। यहां आने वाले परिवादी, वकील और अन्य लोग अपने वाहन सड़कों के बीचों-बीच खड़े कर देते हैं, जिससे कार्यालय समय के दौरान बार-बार जाम की स्थिति पैदा हो रही है। वीआईपी मूवमेंट वाले इन क्षेत्रों में भी सुचारू यातायात के लिए कोई ठोस कार्ययोजना नजर नहीं आ रही है। स्थिति यह है कि अधिकारियों की गाड़ियों को भी कार्यालय में प्रवेश करने के लिए मशक्कत करनी पड़ती है। दुकानों के बाहर खड़े वाहनों ने संकरी की सड़कें शहर के हृदय स्थल माने जाने वाले बाजारों और मुख्य चौराहों पर भी हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। गांधी चौक, निकास गेट और सदर बाजार जैसे संकरे इलाकों में दुकानों के बाहर खड़े दुपहिया और चौपहिया वाहनों के कारण एंबुलेंस जैसे आपातकालीन वाहनों को भी निकलने के लिए रास्ता नहीं मिल रहा है। व्यापारिक प्रतिष्ठानों के बाहर ग्राहकों के साथ-साथ खुद दुकानदारों के वाहन घंटों खड़े रहने से सड़कें संकरी हो गई हैं। शाम के समय जब बाजारों में भीड़ बढ़ती है, तब स्थिति और भी अनियंत्रित हो जाती है। नियमों की उड़ी धज्जियां: नो-पार्किंग के बोर्ड के नीचे ही सज रही वाहनों की कतार हैरानी की बात यह है कि प्रशासन द्वारा लगाए गए ‘नो-पार्किंग’ के बोर्ड केवल दिखावे की वस्तु बनकर रह गए हैं, जिनके ठीक नीचे खड़े वाहन व्यवस्था को मुंह चिढ़ाते नजर आते हैं। लोग बेखौफ होकर मुख्य सड़क के दोनों किनारों पर वाहन पार्क कर रहे हैं। पुलिस की गश्ती टीमें इन क्षेत्रों में केवल खानापूर्ति करती दिखाई देती हैं, जिससे वाहन चालकों के मन से कार्रवाई का भय पूरी तरह समाप्त हो चुका है। पुलिस की इस सुस्ती का खामियाजा शहर की आम जनता को भुगतना पड़ रहा है।


