भास्कर न्यूज | गिरिडीह जिले में मटर की खेती शीतकालीन फसलों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो घरेलू उपभोग के साथ-साथ किसानों की आय बढ़ाने में भी अहम भूमिका निभाती है। हालांकि, सर्दियों के मौसम में विभिन्न रोग मटर की वृद्धि और उपज को गंभीर रूप से प्रभावित करते हैं। ऐसे में सफल खेती के लिए इन रोगों का समय पर पहचान और प्रभावी प्रबंधन अत्यंत आवश्यक है। यह जानकारी कृषि वैज्ञानिक मधुकर कुमार ने दी। उन्होंने बताया कि मटर में पावडरी मिल्ड्यू (एरीसिपे पिसी) एक प्रमुख फफूंदजनित रोग है, जिसमें पत्तियों पर सफेद चूर्ण जैसे धब्बे दिखाई देते हैं और पौधे की वृद्धि रुक जाती है। इसके नियंत्रण के लिए प्रतिरोधी किस्मों की बुवाई, उचित दूरी और सल्फर आधारित फफूंदनाशकों का प्रयोग करना चाहिए।डाउनी मिल्ड्यू (पेरोनोस्पोरा विसिया) में पत्तियों की ऊपरी सतह पर पीलापन और निचली सतह पर बैंगनी मलिनकिरण दिखाई देता है। इसके लिए प्रतिरोधी किस्मों का चयन, संतुलित सिंचाई और आवश्यकता अनुसार फफूंदनाशक उपयोगी हैं। एस्कोकाइटा ब्लाइट रोग में पत्तियों पर काले घाव बनते हैं, जिससे पत्तियां झड़ने लगती हैं। इसके प्रबंधन हेतु फसल चक्र, बीज उपचार और पर्णीय फफूंदनाशक का छिड़काव जरूरी है। फ्यूजेरियम विल्ट में पत्तियों का मुरझाना और पीला पड़ना प्रमुख लक्षण हैं, जबकि जड़ सड़न (राइज़ोक्टोनिया सोलानी) में जड़ों पर भूरे घाव बनते हैं। इन रोगों से बचाव के लिए अच्छी जल निकासी, फसल चक्र और प्रतिरोधी किस्मों का उपयोग करें।एफिड संक्रमण से पत्तियां मुड़ जाती हैं और वृद्धि रुक जाती है। इसके लिए एकीकृत कीट प्रबंधन (आईपीएम) अपनाने की सलाह दी गई। मटर एनेशन मोजेक वायरस रोग से बचाव के िलए रोगमुक्त बीज, एफिड नियंत्रण और संक्रमित पौधों को हटाना जरूरी है। कृषि वैज्ञानिक ने कहा कि शीतकालीन मटर की फसल में रोग प्रबंधन के लिए सही किस्मों का चयन, बीज उपचार, संतुलित सिंचाई, खेत की स्वच्छता और फसल अवशेषों का निस्तारण बेहद जरूरी है। इन उपायों से किसान स्वस्थ फसल और बेहतर उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं। कृषि वैज्ञानिक मधुकर कुमार आप खेती-किसानी से जुड़े किस विषय पर जानकारी चाहते हैं, वॉट्सएप नंबर 7 004690495 पर सिर्फ मैसेज करें।


