भास्कर संवाददाता | विदिशा भगवान ऋषभदेव की निर्वाण स्थली अष्टापद कैलाश पर्वत तक भले ही शरीर से न पहुंच सकें, लेकिन मन और भावना से वहां पहुंचा जा सकता है। यह बात मुनि श्री 108 संभव सागर महाराज ने शीतलधाम विदिशा में भगवान आदिनाथ स्वामी के निर्वाण महोत्सव में कही। उन्होंने बताया कि युग के प्रारंभ में हिमालय की गोद में भगवान आदिनाथ ने 14 दिन तक योग निरोध में तप किया। पौष बदी 14 को उन्होंने सभी कर्मों का नाश कर सिद्धत्व प्राप्त किया। यही आत्मा की पूर्ण यात्रा है, जो परमात्मा बनने की दिशा दिखाती है। मुनि श्री ने कहा कि जब आदिप्रभु का अवतरण हुआ, तब भोग भूमि की व्यवस्था समाप्त हो रही थी। धर्म, कर्म और सामाजिक ढांचा नहीं था। ऐसे समय में भगवान आदिनाथ ने मानव सभ्यता को दिशा दी। उन्होंने असी, मसी, कृषि, वाणिज्य और शिल्पकला का ज्ञान दिया। दीक्षा के बाद उन्होंने एक हजार वर्षों तक तपस्या की। केवलज्ञान प्राप्त कर धर्म का उपदेश दिया और मोक्ष का मार्ग बताया। मुनि श्री ने कहा कि धर्म, कर्म और मोक्ष पुरुषार्थ के जनक भगवान आदिनाथ ही हैं। उन्होंने बताया कि अष्टापद कैलाश पर्वत पर आज भी भगवान के वे चरण मौजूद हैं, जिन्हें इंद्र ने अंकित किया था। सौधर्म इंद्र और भरत चक्रवर्ती ने वहां निर्वाण कल्याणक मनाया था। उसी भाव से विदिशा के शीतलधाम में यह महोत्सव मनाया गया। प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि बाल ब्रह्मचारी तरुण भैया के निर्देशन में बर्रो वाले बाबा आदि ब्रह्मा भगवान आदिनाथ की प्राचीन प्रतिमा का महामस्तकाभिषेक हुआ। ऋद्धि मंत्रों के साथ मुनि श्री के मुख से वृहद शांति धारा संपन्न हुई। भगवान के सहस्त्र नामों का उच्चारण किया गया। विद्याब्राह्मी कल्प का किया शुभारंभ दोपहर बाद मुनि संघ के सानिध्य में श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर, स्टेशन परिसर में शांति धारा के सौजन्य से आयुर्वेदिक उत्पाद “विद्याब्राह्मी कल्प” का शुभारंभ हुआ। मुनि श्री ने बताया कि जैसे शिशुओं के लिए स्वर्ण प्राशन लाभकारी होता है, वैसे ही यह कल्प भी उपयोगी है। आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज की द्वितीय पुण्यतिथि पर 23 जनवरी को इसका निशुल्क वितरण किया जाएगा। इससे स्मरण शक्ति, एकाग्रता और ऊर्जा बढ़ती है। तनाव और मानसिक थकान में राहत मिलती है। रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है। आंवला और ब्राह्मी से युक्त यह कल्प सभी उम्र के पुरुषों, महिलाओं और बच्चों के लिए लाभकारी है।


