शुक्ल… अब शब्दों में मिलेंगे:राजकीय सम्मान के साथ हिंदी साहित्य के शिखर रचनाकार विनोद शुक्ल को अंतिम विदाई

बेहद शांत और सादगी से रहने वाले हिंदी साहित्य के वरिष्ठ रचनाकार विनोद कुमार शुक्ल के शैलेंद्र नगर स्थित निवास में सुबह से गहमा-गहमी रही। आस-पड़ोस, साहित्य और राजनीति से जुड़े लोगों का जमावड़ा वहां लगा रहा। क्योंकि शुक्ल अब देह से हमारे साथ नहीं हैं। बुधवार को मारवाड़ी मुक्तिधाम में राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया। तिरंगे में लिपटी देह, गार्ड ऑफ ऑनर और शोकाकुल मौन… यह दृश्य केवल एक व्यक्ति की विदाई नहीं, बल्कि हिंदी भाषा की आत्मा को नमन का था। उन्हें अंतिम विदाई देने वहां भी बड़ी संख्या में लोग उमड़े रहे। शुक्ल हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन शब्दों में वे मिलते रहेंगे, अपनी कविताओं के जरिए… कथाओं और कहानियों के जरिए। हमेशा…। कुछ देर में कवि कुमार विश्वास उनके घर पहुंचते हैं, श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। बीती रात निधन की सूचना मिलते ही उन्होंने बिलासपुर में अपना कार्यक्रम स्थगित कर दिया था। सुबह करीब 10.30 बजे मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय भी उनके घर पहुंचे और श्रद्धांजलि दी। इसके बाद करीबियों ने तिरंगे में लिपटी उनकी पार्थिव देह को कंधे पर उठाया। सबकी आंखें नम हो गईं। हर आंख नम थी, हर चेहरा गवाह था कि शुक्ल सिर्फ लेखक नहीं थे, वे शब्दों में मनुष्य को बचाने वाले दुर्लभ रचनाकार थे। उनकी रचनाओं की तरह ही उनकी विदाई भी बिना शोर, लेकिन गहरे असर के साथ हुई। राम नाम सत्य है… की गूंज में शववाहन पर उनकी अर्थी रखी गई। गाड़ी में बेटे और चंद खास रिश्तेदारों के साथ उनकी अंतिम यात्रा मारवाड़ी मुक्तिधाम के लिए निकली। पीछे-पीछे बड़ी संख्या में उनके चाहने वाले लोग, मीडिया और शासन का दस्ता चलता है। मुक्तिधाम में लगा रहा तांता… मुक्तिधाम में पुलिस जवान उन्हें गार्ड ऑफ ऑनर देते हैं। वहां भी लोगों का तांता लगा रहता है। बारी-बारी से लोग पुष्प अर्पित करते हैं। सांसद बृजमोहन अग्रवाल, विधायक अनुज शर्मा, पूर्व विधायक विकास उपाध्याय समेत प्रदेश के विशिष्टजनों ने शुक्ल को श्रद्धांजलि अर्पित की। इसके बाद रीति-रिवाजों के साथ उनका दाह संस्कार किया गया। राजकीय सम्मान के साथ हुई अंत्येष्टि यह संकेत भी थी कि शुक्ल का साहित्य केवल संस्कृति नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्मृति का हिस्सा है और रहेगा। शुक्ल चले गए, लेकिन उनकी भाषा, उनकी चुप्पी और उनकी दृष्टि, हिंदी के साथ बनी रहेगी। अंतिम यात्रा में पसरा सन्नाटा उसी लेखन का विस्तार था, कम शब्द-ज्यादा अर्थ। ख्यात अभिनेता आ​शुतोष राणा के शब्द- साहित्य कभी जाता नहीं, वह सदैव वर्तमान रहता है… हिन्दी सिनेमा के प्रसिद्ध अभिनेता आशुतोष राणा ने कहा कि विनोद कुमार शुक्ल जी ने जितना लिखा है, उसके लिए उन्हें केवल ‘साहित्यकार’ कहना मुझे उनके व्यक्तित्व के साथ न्यायपूर्ण नहीं लगता। वे ऐसे व्यक्ति थे, जो स्वयं साहित्य थे। साहित्य कभी जाता नहीं, वह सदैव वर्तमान रहता है। ऐसे लोग इस संसार में आते हैं और हमेशा वर्तमान बने रहते हैं, क्योंकि उनका साहित्य ही उनके व्यक्तित्व और उनकी उपस्थिति का प्रमाण होता है। हिंदी का बड़ा प्रतीक पुरुष विदा: विश्वास
सामाजिक ताने-बाने और प्रचार से दूर रहकर लिखते-पढ़ते रहना, अपनी बात कहते रहना और उसे जगत में छोड़ देना। बिना यह सोचे कि उसे स्वीकृति मिलेगी या नहीं। इस प्रक्रिया का अंतिम नाम विनोद कुमार शुक्ल था। हिंदी का एक बहुत बड़ा प्रतीक पुरुष आज विदा हो गया है।

FacebookMastodonEmail

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *