हाईकोर्ट से अमन सिंह की नजरबंदी को चुनौती देने वाली याचिका खारिज रांची| झारखंड हाईकोर्ट में गुरुवार को पति-पत्नी के बीच चल रहे भरण-पोषण से जुड़े मामले की सुनवाई हुई। जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी की अदालत ने रांची फैमिली कोर्ट के आदेश को सही ठहराते हुए पत्नी को 24 हजार रुपए प्रति माह गुजारा भत्ता देने के निर्देश दिया है। अदालत ने पत्नी द्वारा भरण-पोषण राशि बढ़ाने की मांग तथा पति द्वारा फैमिली कोर्ट के आदेश को निरस्त करने की अपील को खारिज कर दिया। मालूम हो कि पत्नी ने अदालत में याचिका दाखिल कर कहा था कि उनके पति डॉ. प्रसून कुमार पटना के प्रसिद्ध न्यूरो फिजिशियन हैं । उनकी मासिक आय तीन लाख रुपए से अधिक है। इस आधार पर उन्होंने भरण-पोषण राशि बढ़ाकर 60 हजार रुपए प्रति माह करने की मांग की थी। पति ने फैमिली कोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए कहा कि वह पहले ही पर्याप्त राशि दे चुके हैं। तलाक के फैसले के तहत पत्नी के लिए 20 लाख रुपये का स्थाई गुजारा भत्ता भी जमा कर चुके हैं। इसलिए अतिरिक्त भरण-पोषण का आदेश उचित नहीं है। अदालत ने यह भी माना कि पत्नी के पास आय का कोई स्वतंत्र स्रोत नहीं है और फैमिली कोर्ट ने सभी परिस्थितियों का आकलन कर सही निर्णय दिया है। इन आधारों पर हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश में किसी प्रकार का हस्तक्षेप करने से इन्कार करते हुए दोनों याचिकाएं खारिज कर दीं। विशेष संवाददाता | रांची झारखंड हाईकोर्ट में गुरुवार को सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ झारखंड (सीयूजे) से जुड़े मामले की सुनवाई हुई। जस्टिस राजेश कुमार की अदालत में कोर्ट के पूर्व आदेश के आलोक में विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हुए। रजिस्ट्रार की ओर से गलत शपथपत्र दाखिल करने के लिए माफी मांगी गई। अदालत ने उनकी माफी स्वीकार कर ली। सुनवाई के दौरान अदालत ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि शैक्षणिक संस्थानों में सीटें खाली रखना प्राकृतिक संसाधनों की बर्बादी के समान है। इस पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। अदालत ने रजिस्ट्रार को आदेश दिया कि प्रार्थी अमित कुमार चौबे का पीएचडी के इंटरनेशनल रिलेशंस विभाग में नामांकन तीन सप्ताह के भीतर सुनिश्चित किया जाए। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता अफसर रजा ने पक्ष रखा। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट तथा झारखंड हाईकोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि शैक्षणिक संस्थानों में खाली सीटों को अगले सत्र में कैरी फारवर्ड नहीं किया जा सकता। यदि मेधावी छात्र उपलब्ध हों तो सीटें खाली रखना न्यायसंगत नहीं है। दरअसल, यूनिवर्सिटी ने 22 अगस्त 2025 को दाखिल अपने पूरक शपथपत्र में दावा किया था कि वर्ष 2023-24 सत्र में तीन ओबीसी सीटें खाली थीं, जिन्हें सामान्य वर्ग के अभ्यर्थियों को नहीं दिया जा सकता था। इसलिए उन्हें अगले सत्र में कैरी फारवर्ड कर दिया गया। इसी नीति को चुनौती देते हुए अमित कुमार चौबे ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। झारखंड हाईकोर्ट में गुरुवार को अपराध नियंत्रण अधिनियम के तहत अमन सिंह उर्फ अमन शेखर नजरबंदी को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी है। चीफ जस्टिस और जस्टिस एके राय की अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि नजरबंदी आदेश कानून के अनुरूप है और इसमें हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता। अदालत ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता द्वारा जेल प्रशासन पर लगाए गए आरोपों के समर्थन में कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया। कोर्ट ने माना कि आरोप की गतिविधियां असामाजिक तत्व की श्रेणी में आती हैं और पूर्वी सिंहभूम जिला प्रशासन द्वारा जारी नजरबंदी आदेश पूरी तरह वैध है। पुलिस रिपोर्ट के अनुसार अमन सिंह पर हत्या के प्रयास, चोरी, रंगदारी, आर्म्स एक्ट सहित कुल आठ आपराधिक मामले दर्ज हैं। उसे लगातार आपराधिक गतिविधियों में संलिप्त पाया गया था। जिला दंडाधिकारी ने 14 मई 2025 को झारखंड कंट्रोल ऑफ क्राइम्स एक्ट के तहत तीन महीने के लिए हिरासत में रखने का आदेश दिया था। 30 जुलाई और 30 अक्टूबर 2025 को नजरबंदी की अवधि बढ़ाई गई, जिसकी राज्य सरकार ने भी पुष्टि की थी।


