विजय शर्मा | कोंडागांव शासन-प्रशासन की राह देखने के बजाय जब गांव खुद पहल करे, तो असंभव भी संभव हो जाता है। कोंडागांव जिले के एक छोटे से गांव ने यही कर दिखाया है। शिक्षा और आस्था के प्रति गहरी लगन ने ग्रामीणों को एकजुट किया और सभी ने मिलकर श्रमदान से लकड़ी का बेली ब्रिज तैयार कर डाला, जो आज गांव के लिए जीवनरेखा बन चुका है। दरअसल, बरसात के दिनों में गांव के चारों ओर बहने वाले नालों में पानी भर जाने से रास्ते पूरी तरह बंद हो जाते थे। सबसे ज्यादा परेशानी स्कूली बच्चों को होती थी, जिन्हें स्कूल पहुंचने में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। वहीं गांव के शिव मंदिर तक पहुंचना भी जोखिम भरा हो जाता था। बारिश के समय कई बार बच्चों की पढ़ाई बाधित हो जाती और श्रद्धालु मंदिर नहीं जा पाते थे। गांव के ग्राम पटेल ज्ञान सिंह ठाकुर ने बताया कि पिछले वर्ष भी बारिश के दौरान यही समस्या सामने आई थी। तब ग्रामीणों ने तय कर लिया कि अब हर साल परेशानी झेलने के बजाय स्थायी समाधान निकाला जाएगा। शासन-प्रशासन पर निर्भर रहने के बजाय आपसी सहयोग और श्रमदान से पुल बनाने का निर्णय लिया गया। सभी की सहमति के बाद गांव के शिल्पकार दयाराम साहू ने लकड़ी के बेली ब्रिज का डिजाइन तैयार किया। आखिरकार गांव की एकजुटता रंग लाई और लकड़ी का पुल बनकर तैयार हो गया। इस पुल के बनने के बाद बरसात के मौसम में भी बच्चे बिना डर के स्कूल जाने लगे हैं और श्रद्धालु रोजाना शिव मंदिर पहुंचकर पूजा-अर्चना कर रहे हैं। यह पुल सिर्फ रास्ता नहीं, बल्कि गांव की उम्मीद और आत्मनिर्भरता की पहचान बन गया है। आज इस पुल को बने एक साल पूरा हो चुका है। खास बात यह है कि गांव के लोग अब भी इसकी नियमित देखरेख करते हैं। कहीं कोई लकड़ी कमजोर तो नहीं हुई, कहीं मरम्मत की जरूरत तो नहीं इस पर सभी बराबर नजर रखते हैं। यह जिम्मेदारी सामूहिक रूप से निभाई जा रही है। गांव की यह छोटी-सी पहल एक बड़ी समस्या का समाधान बन गई है। यह कहानी न सिर्फ लगन, शिक्षा और आस्था की मिसाल है, बल्कि आसपास के अन्य गांवों के लिए भी प्रेरणा है।


