श्रमिक बोले-14 घंटे कराते थे काम; न भरपेट खाना मिलता था, न वेतन

शुक्र है… अपने वतन की रोटी मिली, 47 श्रमिक फंसे थे, 11 श्रमिक 29 दिसंबर को लौटे थे अफ्रीका के कैमरून में फंसे झारखंड के 27 श्रमिक गुरुवार को रांची पहुंच गए। इनमें से तीन श्रमिक दोपहर दो बजे, तीन शाम चार बजे, चार शाम साढ़े सात बजे और 17 श्रमिक रात आठ बजे की फ्लाइट से पहुंचे। श्रम विभाग के अधिकारियों ने बिरसा मुंडा एयरपोर्ट पर उनका स्वागत किया। आठ श्रमिक शुक्रवार सुबह आएंगे। एयरपोर्ट पर राज्य प्रवासी नियंत्रण कक्ष की टीम लीडर शिखा लकड़ा को इन श्रमिकों ने अपनी पीड़ा बताई। हजारीबाग के विष्णुगढ़ निवासी श्रमिक लोकनाथ यादव ने बताया कि हमें एक एजेंट यहां से ठगकर कैमरून ले गया था। कहा था कि अच्छा वेतन मिलेगा। लेकिन वहां हमें कॉन्ट्रैक्ट पर डाल दिया गया। कंपनी के लोग हमसे काम कराते थे, लेकिन वेतन नहीं देते थे। वहीं गोमिया के महेश महतो ने कहा कि हम कैमरून में काफी कष्ट में थे। हमें तीन महीने से वेतन नहीं मिला था। हमसे ओवरटाइम करवाया जाता था। एक दिन में 14-14 घंटे काम लिया जाता था ओर भरपेट भोजन भी नहीं मिलता था। खाने-पीने में काफी दिक्कत थी। काम भी दोगुना लेते थे। हमने फेसबुक पर वीडियो डालकर अपना दुख जताया। सरकार से हमें वापस बुलाने की मांग की। झारखंड सरकार ने हमारी तकलीफ को समझा और हमें रिहा करवाया। यहां के कुल 47 श्रमिक वहां फंस गए थे, जिनमें से 11 श्रमिक 29 दिसंबर को लौट आए थे। हजारीबाग, बोकारो और गिरिडीह के ये श्रमिक कैमरून में मेसर्स ट्रांसरेल लाइटिंग लिमिटेड में अगस्त 2024 से कार्यरत थे। कंपनी ने उनका वेतन रोक दिया था। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को जानकारी मिली तो उन्होंने राज्य प्रवासी नियंत्रण कक्ष को तत्काल कार्रवाई का निर्देश दिया। फिर नियंत्रण कक्ष ने श्रमिकों और कंपनी से संपर्क किया। ​इन जिलों के श्रम अ​धीक्षकों ने नियोजकों, नियोक्ताओं और बिचौलियों पर एफआईआर भी दर्ज कराई। कंट्रोल रूम लगातार संपर्क में रहा और श्रमिकों को 39.77 लाख रुपए बकाए का भुगतान कराया। फिर इन्हें सुरक्षित भारत लाया गया। मुख्यमंत्री ने विभागीय सचिव को इन्हें सरकारी योजनाओं से जोड़ने का निर्देश दिया है।

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