खड़गवां/बैकुंठपुर | जनपद परिसर में चल रही श्रीमद्भागवत महापुराण ज्ञान यज्ञ कथा के दूसरे दिन 17 मई को सीधी से आए दीपू महाराज ने राजा परीक्षित और सुखदेव संवाद का वर्णन किया। उन्होंने सुखदेव जी के जन्म और समीक ऋषि प्रसंग को भी विस्तार से सुनाया। कथा के दौरान दीपू महाराज ने बताया कि पुण्य कर्म कभी व्यर्थ नहीं जाता। उन्होंने कहा कि एक बार राजा परीक्षित वन में प्यास से व्याकुल होकर समीक ऋषि के आश्रम पहुंचे। ऋषि उस समय समाधि में लीन थे। राजा ने इसे अपमान समझा और एक मरे हुए सर्प को ऋषि के गले में डाल दिया। यह देख ऋषि के पुत्र ने क्रोधित होकर श्राप दिया कि सातवें दिन तक्षक नाग आकर राजा को डसेगा। जब समीक ऋषि को इस घटना का ज्ञान हुआ, तो उन्होंने दिव्य दृष्टि से देखा कि राजा परीक्षित धर्मात्मा हैं।


