राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष में शुक्रवार को दशहरा मैदान पर मालवा प्रांत का घोष वादन हुआ। संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत की मौजूदगी में 870 स्वयं सेवकों ने 67 मिनट तक घोष वादन किया। इस दौरान संघ प्रमुख ने शाखा में होने वाले लाठी और डंडा अभ्यास का जिक्र करते हुए कहा कि इसका उद्देश्य झगड़ा करना नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया, हम झगड़ा नहीं करते, लेकिन यदि कोई आ जाए तो उसका इलाज करना पड़ता है। लाठी चलाने से मनुष्य वीरता प्राप्त करता है और निर्भीक बनता है। उन्होंने एक किस्सा सुनाया जिसमें एक व्यक्ति ने लाठी के बूते डाकुओं को खदेड़ दिया था। कार्यक्रम में शहर के 500 से ज्यादा समाजों के प्रमुख, जनप्रतिनिधि, प्रबुद्धजन और स्वयं सेवक परिवार सहित शामिल हुए। इस दौरान भारत पीछे रहने वाला देश नहीं, हम दुनिया को बता सकते है कि हमारे पास क्या है
भागवत ने कहा कि भारत पीछे रहने वाला देश नहीं है। हम दुनिया को बता सकते हैं कि हमारे पास क्या है? हम दरिद्र नहीं हैं। अब हम विश्व पटल पर खड़े हैं। संघ के कार्यक्रमों में मनुष्य में सद्गुणों की वृद्धि होती है। उन्होंने कहा हमारी रण- संगीत की परंपरा थी जो अब फिर लौट आई है। भागवत बोले- जब लोग खुद पूंछे- शाखा कहां लगती है..तभी कार्यकर्ता की तपस्या सफल भागवत ने कहा, यह तपस्या जब सफल होगी, जब आप लोग ऐसा पूछने लगेंगे कि संघ की शाखा कहां लगती है। मेरे लायक कोई कार्य तो नहीं। मेरा आह्वान है कि इस घोष वादन को देखने के बाद इस बार में सोचिए। आनंद लिजिए, स्मरण रखिए, यह तो अच्छी बात है। लेकिन स्मरण कीजिए कि इसकी जड़ कहां है। उस जड़ तक पहुंचें। अच्छे जीवन के साथ हमारे देश का जीवन और अच्छा बने इस दिशा में कार्य करें। ऐसा हुआ तो सारी दुनिया सुख-शांति से भरा नया युग देखेगी। 100 वर्षों की रूपरेखा… भागवत बोले- घोष वादन कला प्रदर्शन नहीं, बल्कि इसका उद्देश्य राष्ट्र निर्माण के प्रति जागरूकता बढ़ाना है। यह 20-40 लोगों के बीच भी हो सकता था, लेकिन इसे सार्वजनिक रूप से करने का मकसद आप सभी राष्ट्र निर्माण के महाअभियान में सक्रिय भूमिका निभाएं। उन्होंने इस दौरान आरएसएस के 100 वर्षों की यात्रा व उद्देश्य की रूपरेखा भी प्रस्तुत की।


