संत धैर्य मुनि और धीरज मुनि का रविवार को अपने जन्मस्थान ब्यावर में भव्य स्वागत किया गया। वे भीलवाड़ा के आसींद कस्बे में वर्षाकालीन चातुर्मास पूर्ण कर संयम जीवन धारण करने के बाद पहली बार ब्यावर पहुंचे थे। संतों के दर्शन के लिए सैकड़ों श्रावक-श्राविकाएं उमड़ पड़े, जिससे पूरा क्षेत्र ‘भगवान महावीर’, ‘पन्ना गुरु’ और ‘सोहन गुरु’ के जयकारों से गूंज उठा। प्रातःकाल, संत धैर्य मुनि और संत धीरज मुनि ने चंपा नगर स्थित एक वरिष्ठ श्रावक के आवास से अपनी विहार यात्रा प्रारंभ की। संत मंडल ने सामूहिक नवकार महामंत्र का उच्चारण और जैन मांगलिक के साथ यात्रा का शुभारंभ किया। यह विहार यात्रा चंपा नगर से मुख्य मार्गों से होते हुए पिपलिया बाजार स्थित जैन स्थानक तक पहुंची, जहाँ संतों का भव्य मंगल प्रवेश हुआ। इस अवसर पर संघ सिरमौर महेंद्र सांखला, मंत्री पदम बंब, पूर्व अध्यक्ष प्रकाश चंद मेहता सहित जैन समाज के विभिन्न संघों के प्रतिनिधियों और बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने संतों का वंदन किया और उनकी अगुवाई की। पिपलिया बाजार जैन स्थानक में आयोजित प्रवचन में संत धैर्य मुनि ने कहा कि संयम ही जीवन का वास्तविक आनंद है। उन्होंने बताया कि संयमी जीवन मर्यादित और स्वास्थ्यप्रद होता है, जिससे ‘हाथा-जोड़ी’, ‘माथा-फोड़ी’ और ‘भागा-दौड़ी’ जैसी उलझनें समाप्त हो जाती हैं। संत धैर्य मुनि ने आगे कहा कि यदि कोई व्यक्ति पूर्ण संयम धारण नहीं कर सकता, तो वह श्रावक जीवन अपनाकर भी अपने जीवन को सार्थक बना सकता है। उन्होंने संयम जीवन की श्रेष्ठता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि देवता भी इसे प्राप्त करने के लिए आतुर रहते हैं। तीर्थंकरों ने भी संयम के माध्यम से ही अपने लक्ष्यों को प्राप्त किया। उन्होंने जोर दिया कि केवल मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जो संयम को धारण कर सकता है। संतों के मंगल प्रवचन और दर्शन का लाभ लेने के लिए जैन वीर संघ सहित सकल जैन समाज के विभिन्न संगठनों के प्रमुख, महिला मंडलों के प्रतिनिधि और बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं मौजूद रहे। सभी ने इस अवसर पर धर्मलाभ प्राप्त किया।


