गुमला| ट्राइकोडर्मा एक उपयोगी जैविक फफूंदनाशी है, जो प्राकृतिक रूप से मिट्टी में पाया जाने वाला एक लाभकारी कवक है। जिला कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक डॉ संजय कुमार ने कहा कि यह सब्जियों सहित विभिन्न फसलों को मृदाजनित रोगों से बचाने और पौधों के समग्र स्वास्थ्य में सुधार के लिए उपयोग किया जाता है। सब्जी में ट्राइकोडर्मा के मुख्य लाभ : ट्राइकोडर्मा जड़ सड़न, डंपिंग ऑफ, कालर रॉट, विल्ट (म्लानि), ब्लाइट जैसे रोगों के रोगकारक फफूंद (जैसे फ्यूजेरियम, राइजोक्टोनिया, स्क्लेरोशियम) पर प्रभावी नियंत्रण करता है। यह पौधों की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है, जिससे वे रोगों के विरुद्ध बेहतर तरीके से लड़ते हैं। ट्राइकोडर्मा जैविक रूप से कार्बनिक पदार्थों का अपघटन करता है और मिट्टी में सूक्ष्मजीवों की गतिविधि बढ़ाता है, जिससे मिट्टी अधिक जीवंत और उपजाऊ बनती है।बीज उपचार में उपयोगी होता है। सब्जियों के बीजों को ट्राइकोडर्मा से उपचारित करने पर अंकुरण बेहतर होता है और पौध आरंभ से ही स्वस्थ रहती है। ट्राइकोडर्मा के नियमित प्रयोग से रासायनिक दवाओं पर निर्भरता कम होती है, जिससे लागत घटती है और पर्यावरण भी सुरक्षित रहता है। यह एक स्वच्छ और पर्यावरण अनुकूल विकल्प है, जिसे जैविक खेती में भी अनुमति प्राप्त है। बीज उपचार 5-10 ग्राम ट्राइकोडर्मा प्रति किलो बीज के हिसाब से। पौधों की जड़ों को 10 ग्राम/लीटर पानी में घोलकर रोपण से पहले डुबोएं। प्रति एकड़ 2-5 किलो ट्राइकोडर्मा को सड़ी गोबर की खाद या वर्मी कम्पोस्ट में मिलाकर खेत में प्रयोग करना चाहिए । डॉ. संजय कुमार। आप खेती-किसानी से जुड़े किस विषय पर जानकारी चाहते हैं, वॉट्सएप नंबर 7482098079 पर सिर्फ मैसेज करें।


