सरकारी जमीन मामलों में अब मुख्य सचिव का हलफनामा अनिवार्य:कोर्ट ने कहा-संदिग्ध अधिकारियों पर कार्रवाई की जाएगी या नहीं सीएस को शपथपत्र में करना होगा स्पष्ट

ग्वालियर हाईकोर्ट की एकल पीठ ने सरकारी जमीन से जुड़े मामलों में राज्य शासन और अधिकारियों की लगातार लापरवाही पर कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि अब सरकारी भूमि से संबंधित किसी भी मामले में राज्य सरकार द्वारा दाखिल किए जाने वाले आवेदन मुख्य सचिव के शपथ पत्र के बिना स्वीकार नहीं किए जाएंगे। कोर्ट ने सरकारी मामलों की पैरवी में गंभीरता की कमी और अधिकारियों की निष्क्रियता से निजी पक्षों को अनुचित लाभ मिलने पर गहरी चिंता जताई। न्यायालय ने मुख्य सचिव से यह भी पूछा है कि क्या वे लापरवाह या संदिग्ध भूमिका निभाने वाले अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करना चाहते हैं। यह आदेश जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण केंद्र दतिया द्वारा माया बलवानी के खिलाफ दायर सेकेंड अपील पर सुनवाई के दौरान गुरुवार को दिया गया। प्रशिक्षण केंद्र ने जिला न्यायाधीश दतिया के 2 दिसंबर 2003 के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दाखिल की थी, जिसमें 2800 स्क्वायर फीट जमीन को सरकारी बताया गया था। अपील दाखिल करने में गंभीर चूक हाईकोर्ट ने पाया कि अपील दाखिल करने की प्रक्रिया में गंभीर लापरवाही बरती गई। शुरुआत में अपील राज्य सरकार द्वारा विधिवत रूप से दाखिल न होकर जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण केंद्र और राज्य शिक्षा केंद्र के माध्यम से प्रस्तुत की गई, जबकि नियमानुसार राज्य सरकार को कलेक्टर दतिया के जरिए अपीलकर्ता होना चाहिए था। बाद में राज्य को अपीलकर्ता बनाया गया, लेकिन तब भी देरी के लिए कोई संतोषजनक कारण या शपथ पत्र प्रस्तुत नहीं किया गया। सेकेंड अपील के लिए आवश्यक ‘लीव टू अपील’ का आवेदन भी विधिवत रूप से तैयार नहीं किया गया, जिसे वर्ष 2014 में खारिज कर दिया गया। इसके बाद बहाली का आवेदन दाखिल हुआ, जो लगभग दस वर्ष तक लंबित रहा और सितंबर 2025 में जाकर अपील बहाल हो सकी। इसके बावजूद आवश्यक कानूनी औपचारिकताओं का पालन नहीं किया गया। अदालत ने कहा कि ऐसी स्थिति में देरी माफी या विधिवत अनुमति के अभाव में अपील खारिज करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। मुख्य सचिव का शपथपत्र अनिवार्य कोर्ट ने निर्देश दिए कि कलेक्टर और अधिकारियों पर गंभीर टिप्पणी न्यायालय ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि वह लगातार देख रहा है कि कलेक्टर और उनके वरिष्ठ अधिकारी सरकारी भूमि से जुड़े मामलों में घोर लापरवाही बरत रहे हैं। यह स्थिति निजी पक्षों को अनुचित लाभ पहुंचाने की मंशा को भी दर्शा सकती है। कोर्ट ने इसे बेहद गंभीर विषय बताते हुए कहा कि ऐसी लापरवाही से राज्य की मूल्यवान सार्वजनिक संपत्ति को भारी नुकसान पहुंचने का खतरा है।

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