जयपुर के रामनगर सोडाला के रहने वाले आशीष कुमार बैरवा ने दहेज प्रथा के खिलाफ खड़े होकर समाज को एक नई दिशा दिखाई है। तृतीय श्रेणी शिक्षक पद पर चयनित होने के बावजूद आशीष ने साफ शब्दों में तय कर लिया था कि वे दहेज मुक्त विवाह करेंगे। दहेज के नाम पर एक रुपया भी स्वीकार नहीं करेंगे। आशीष का मानना है कि जब वे स्वयं शिक्षक हैं और बच्चों को शिक्षा देना उनका दायित्व है तो पहले उन्हें वही शिक्षा अपने जीवन में उतारनी होगी। आए दिन दहेज को लेकर हो रही घटनाओं और समाचारों ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया, जिसके बाद उन्होंने निश्चय किया कि वे केवल कन्या और कलश के पारंपरिक रिवाज के साथ ही विवाह करेंगे। साधारण परिवार, लेकिन असाधारण सोच आशीष के पिता चिरंजी लाल बैरवा पेशे से इलेक्ट्रीशियन हैं, जबकि माता गीता देवी गृहिणी हैं। दादा मोतीलाल बैरवा राजमिस्त्री रहे हैं और दादी गुलाब देवी गृहिणी। आर्थिक रूप से सामान्य परिवार होने के बावजूद, पूरे परिवार ने आशीष के इस निर्णय पर सहमति जताई, जो अपने आप में एक बड़ी बात है।
सरकारी नौकरी लगने के बाद आशीष के लिए कई ऐसे रिश्ते भी आए, जिनमें कार और भारी दहेज की सीधी पेशकश की गई, लेकिन आशीष ने पहले ही दिन यह स्पष्ट कर दिया कि वे केवल सवा रुपया शगुन के रूप में लेंगे, उससे अधिक कुछ भी स्वीकार नहीं करेंगे। ससुराल पक्ष की भी सराहनीय भूमिका जब आशीष को लड़की पसंद आई तो ससुराल पक्ष के किसान और राजमिस्त्री गोपाल बैरवा और उनकी पत्नी लक्ष्मी देवी ने अपनी श्रद्धा के अनुसार दहेज देने की बात कही। इस पर आशीष और उनके परिजनों ने विनम्रता लेकिन दृढ़ता से दहेज लेने से इनकार कर दिया। शुरुआत में ससुराल पक्ष को लगा कि कहीं उन्हें आर्थिक रूप से कमजोर समझकर दहेज मना तो नहीं किया जा रहा, लेकिन बातचीत के बाद जब उन्हें बताया गया कि यह आशीष का पहले से लिया गया निर्णय है तो उन्होंने भी इस सोच का सम्मान किया। बिना दहेज, सादगी से हुआ विवाह 4 फरवरी 2025 को वह शुभ दिन आया, जब आशीष ने आशा के साथ बिना किसी दहेज के विवाह कर समाज में एक सशक्त संदेश दिया कि ‘बिना दहेज के भी विवाह संभव है।’ दहेज लेना और देना दोनों ही कानूनन अपराध हैं, लेकिन इसके बावजूद आज भी बेटियों के पिता कर्ज के बोझ तले दब जाते हैं। आशीष का यह कदम न सिर्फ एक परिवार, बल्कि कई परिवारों के लिए प्रेरणा बन गया है। बहन न होने के बावजूद भी दहेज से इनकार आशीष दो भाइयों में से एक हैं और उनकी कोई बहन नहीं है। यानी यह तर्क भी नहीं दिया जा सकता कि उन्हें भविष्य में बहन की शादी के लिए दहेज देना पड़ेगा। इसके बावजूद उन्होंने दहेज के पूरी तरह विरोध का रास्ता चुना। यह दिखाता है कि दहेज विरोध सिर्फ मजबूरी नहीं, बल्कि सोच और संस्कार का विषय है। समाज में मिली सराहना आशीष, उनके माता-पिता और पूरे परिवार के इस निर्णय की समाज के सभी वर्गों ने खुले दिल से सराहना की है। लोगों का कहना है कि यदि हर सरकारी कर्मचारी और शिक्षित युवा ऐसा संकल्प ले, तो दहेज जैसी कुप्रथा अपने आप समाप्त हो सकती है। आज जब लोग सरकारी नौकरी को दहेज कमाने का साधन बना चुके हैं, ऐसे समय में आशीष कुमार बैरवा ने सिर्फ सवा रुपये में विवाह कर यह साबित कर दिया कि बदलाव की शुरुआत एक व्यक्ति से भी हो सकती है।


