नमस्कार कृषि मंत्रीजी को लगता है कि किसान जरूरत से ज्यादा खाद ले रहा है। जबकि खाद के लिए किसानों के साथ-साथ अब आधार कार्ड भी लाइन में हैं। सांसद अमराराम की ऐसी तस्वीर आई, जिससे दिल्ली की ठंड का अंदाजा लगाया जा सकता है। उदयपुर में सरकारी हॉस्पिटल से दवाएं और उपकरण चुराकर एक नर्सिंग अधिकारी ने अपना दोमंजिला अस्पताल बना लिया। राजस्थान की राजनीति और ब्यूरोक्रेसी की ऐसी ही खरी-खरी बातें पढ़िए, आज के इस एपिसोड में… 1. खाद के लिए कतार में आधार कार्ड ‘इस बार जोरदार बारिश हुई। ऊपरवाले की मेहरबानी। किसानों ने फसलों का रकबा बढ़ा दिया। इतना ही नहीं, रबी की फसल बोने में इतनी तड़ा-पड़ी दिखाई कि दिसंबर में बोने वाला गेहूं नवंबर में ही बो दिया।’ कृषि मंत्रीजी खाद की किल्लत पर बोल रहे थे। बहुत सारी कागजों में आंखें गड़ा-गड़ाकर उन्होंने खाद की किल्लत का ये लब्बोलुआब निकाला। वे यहीं नहीं रुके। आगे बोले-किसान को चाहिएं खाद के 2 कट्टे, ले जा रहा है 10-10, इन सब कारणों से खाद की कमी हो गई है। कुल मिलाकर सारी गलती किसान की है। किसान ही खाद की कालाबाजारी रहा है। वही खाद बेच-बेचकर अपने भंडार भर रहा है। भीलवाड़ा में जहाजपुर के भगुनगर गांव की तस्वीरें देखिए। इतनी ठंड में बूढ़े, बच्चे, जवान, महिलाएं सब सुबह 5 बजे लाइन में लग गए। ग्राम सेवा सहकारी समिति से खाद का कट्टा लेना था। व्यवस्था बनाए रखने के लिए आधार कार्ड, राशन कार्ड की फोटो कॉपियां लाइन में रख दीं। कागजों पर ढेला रख दिया ताकि उड़ें नहीं। किसान रोटी खिलाए और खुद गाली खाए। खाद की किल्लत दूर करने के लिए काम करना जरूरी है या किसान को ही कठघरे में खड़ा कर छुट्टी पा ली जाए? 2. नर्सिंग अफसर ने सरकारी दवाएं चुराकर बना लिया दोमंजिला हॉस्पिटल इन दिनों एक अचार सभी जगह उपलब्ध है। वह है भ्रष्टाचार। जिसे जहां-जैसे मौका मिल रहा है, वही वहीं किसी न किसी तरकीब से भ्रष्टाचार कर रहा है। कुछ ईमानदारों पर ही धरती टिकी हुई है। वरना सब गुड़-गोबर हो गया होता। देखिए उदयपुर में क्या हुआ। यहां सायरा में सरकारी हॉस्पिटल है। अस्पताल में 25 साल से नर्सिंग अधिकारी काम कर रहा है। सरकार तनख्वाह दे रही है। लेकिन साहब का पेट रोटी से नहीं भरता, स्टेटस से भरता है। जनाब कई साल से गरीब मरीजों को मुफ्त मिलने वाली दवाएं हॉस्पिटल के स्टॉक से गायब कर रहे थे। इतना गबन किया कि खुद का दो मंजिला और नौ बेड का हॉस्पिटल तैयार कर लिया। इतने साल में कितने ही मरीजों को मुफ्त दवा वितरण केंद्र से खाली हाथ लौटना पड़ा होगा। गरीब मरीजों ने महंगी दवा लेने के स्थान पर घरेलू उपचार कर संतोष कर लिया होगा। बार-बार दवा वितरण केंद्र के चक्कर काटे होंगे। कितनी ही बार नहीं है सुनकर निराश लौटा होगा। जिस सीएमएचओ ने छापा मारा वह खुद हैरान। उसने मेडिकल इंचार्ज मैडम को बुलाया। एक-एक दवा उसके हाथ में पकड़ाई और पूछा- ये सरकारी ही हॉस्पिटल की है। मैडम क्या बोले। घबराई सी बोली कि दवा तो सरकारी ही है लेकिन मुझे तो कभी इनकी शिकायत ही नहीं मिली। मैं तो इस तरफ कभी आई ही नहीं। सीएमएचओ ने लताड़ा-हम तक सूचना आ गई, तुम तक नहीं आई? लोभी नर्सिंग अधिकारी को एपीओ कर दिया है। मैडम को हटाकर दूसरी जगह लगा दिया है। लेकिन क्या ये सजा पर्याप्त है। बहाल होते ही फिर से भ्रष्टाचार के अचार की बरनियां भरने लगेंगे। 3. बाड़मेर में SDM-प्रधान के बीच तीखी बहस पंचायत और प्रधानजी का जिक्र होते ही फुलेरा वाली पंचायत और जीतू भैया जेहन में आते हैं। लेकिन बाड़मेर में प्रधानजी और एसडीएम साहब के बीच जो नोक-झोंक हुई है, उसने सच में पंचायत सीरीज की याद ताजा कर दी। मामला गुड़ामालानी का है। पंचायत के प्रधानजी बिजलाराम परेशान। उन्हें लगता है कि उनके दफ्तर में एजेंट भरे पड़े हैं। ये एजेंट उनकी हर बात काटते हैं और वही काम नहीं करते जो प्रधानजी करने को कहते हैं। गांव में प्रधानजी की किरकिरी होती जा रही थी। न किसानों को फसल बीमा क्लेम मिल रहा था, न सड़क-सफाई का काम हो रहा था, न बिजली की समस्या दूर हो रही थी। चुनाव भी सिर पर आ गए हैं। प्रधानजी ने एसडीएम साहब को कई चिटि्ठयां लिखीं लेकिन संतोष प्रदान करने वाला जवाब नहीं मिला। ऐसे में भीड़ इकट्ठी कर प्रधानजी पहुंच गए एसडीएम साहब से वार्ता करने। अब जो दोनों के बीच तीखी बहस हुई, इसमें मीठी गोली और चांद ले आने तक का जिक्र हो गया। प्रधान बिजलाराम ने बिजली गिराई- हमने इतने लैटर लिखे आपने जवाब नहीं दिया…हर बार मीठी गोली दे देते हो। एसडीएम केशव कुमार ने केस की दुम पकड़ने का प्रयास किया- हमारा काम है चिट्ठी मिलने पर ऊपर चिट्ठी लिख देना, वो काम हमने कर दिया। बाकी आप चांद तोड़कर ला दो, वो होने से रहा। प्रधानजी भड़के- अरे, हमारी कोई सुनता ही नहीं, चमचे और एजेंट भरे पड़े हैं। बताओ हम क्या करें? एसडीएम ने सलाह दी- कोई सुनता ही नहीं है तो कैसे प्रधान हो, दे दो इस्तीफा। प्रधानजी रोये नहीं और बाकी रहा नहीं। असहाय से बोले- इस्तीफा ही है। 4. चलते-चलते… ठिठुरते हुए गणतंत्र से पहले ही ठिठुरते हुए सांसदजी की तस्वीर सामने आ गई है। जब तक दिल्ली में उत्तरी हवाएं नहीं चलीं थीं, सांसद महोदय सरकारी आवास की छत पर आधी धूप-आधी छाया में हुक्का नजदीक रख इत्मीनान से लोगों से महत्वपूर्ण चर्चाएं करते थे। खादी का कुर्ता पायजामा पर्याप्त रहता था। गर्म दुशाला डाल लेने पर धूप में कुछ ही देर बाद चांटा-चूंटी होने लगती थी। सांसद जी शेखावाटी से आते हैं। सीकर से लोकसभा चुनाव का गढ़ जीता। शेखावाटी की ठंड शिमला को टक्कर देती है। लेकिन दिल्ली की ठंड के मायने अलग हैं। दिल्ली की सर्दी पर बॉलीवुड भी नतमस्तक है। वहां ठंड पड़े तो गीत बन जाते हैं। शेखावाटी की ठंड में धूजणी पधारो म्हारे देस भी बिना ब्रेक नहीं गाने देती। दिसंबर का एक ही हफ्ता बीता है। एक कार्यकर्ता सीकर से दिल्ली गए तो सांसद महोदय के साथ चाय पीने का मौका मिल गया। सांसदजी के आवास पर पहुंचा तो एकबारगी पहचान नहीं पाया। सांसद अमराराम पूरी तरह चादर में लिपटे हुए। सिर्फ आंख-नाक, चश्मा और मुंह का कुछ अंश दिख रहा था। कुल मिलाकर इतने ही दिख रहे थे कि कहा जा सके कि सांसद अमराराम ही हैं। चांद भले दूज का हो या पूरणमासी का। चांद ही कहलाता है। कम दिखने के बावजूद भी वे अमराराम ही रहे। खैर कोई बात नहीं, देश में जितनी मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी दिख रही है, उतने तो दिख ही रहे हैं। वीडियो देखने के लिए ऊपर फोटो पर क्लिक करें। अब मंगलवार को मुलाकात होगी…


